सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
Page 149 of 590
Read in contextजीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ११९
कौन्तेय इव राधेयो जीवः स्वाविद्यया परः ।
नाऽभासो नाऽप्यवच्छिन्न इत्याहुरपरे बुधाः ॥४२॥
जैसे कौन्तेय ही राधेय है, वैसे ही परमात्मा ही अपनी अविद्यासे जीवभावापन्न होता है, न प्रतिबिम्ब है और न अवच्छिन्न है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥४२॥
अपरे तु न प्रतिबिम्बः, नाऽप्यवच्छिन्नो जीवः । किन्तु कौन्तेयस्यैव राधेयत्ववदविकृतस्य ब्रह्मण एव अविद्यया जीवभावः । व्याध-कुलसंवर्धितराजकुमारदृष्टान्तेन 'ब्रह्मैव स्वाविद्यया संसरति, स्वविद्यया मुच्यते' इति बृहदारण्यकभाष्ये प्रतिपादनात् ।
कुछ लोग कहते हैं कि प्रतिबिम्ब जीव नहीं है और अवच्छिन्न भी जीव नहीं है, किन्तु जैसे कुन्तीके ही पुत्र कर्णमें राधेयत्व ( दासीपुत्रत्व ) का व्यवहार होता है, वैसे ही अविकृत ब्रह्ममें ही अविद्यासे जीवभावका व्यवहार होता है, क्योंकि बृहदारण्यकभाष्यमें—व्याधकुलसंवर्धितराजकुमारके दृष्टान्तसे * 'ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे संसारका भागी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है, ऐसा—प्रतिपादन किया गया है । और 'राजसूनो०'
भावेन करोति' इत्यादि श्रुतिमें आभासशब्दका अर्थ अवच्छिन्न है, प्रतिबिम्ब अर्थ नहीं है, यह कहा जा चुका है । 'माया च अविद्या च स्वयमेव भवति' इसमें माया शब्दार्थ है—'कार्योपाधिरयं जीवः' इस श्रुतिके अनुसार अन्तःकरण । मायापदसे गृहीत अन्तःकरणमें माया-शब्दका प्रयोग इसलिए है कि यह प्रकृतिका विकार है । अनवच्छिन्नचैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, वह चित्रदीपके आधारपर और अन्तःकरणाभावावच्छिन्नचैतन्य ईश्वर है, यह सम्भवमात्रसे कहा गया है, तात्पर्यसे नहीं कहा गया है, अन्यथा 'कारणोपाधिरिश्वरः' इस श्रुतिके साथ विरोध होगा । अनवच्छिन्नको ईश्वर माननेपर किसी उपाधिके न रहनेसे ईश्वर सर्वज्ञ कैसे होगा ? इस प्रश्नका उत्तर उन्हींसे पूछना चाहिए । इसीलिए वाक्यवृत्तिमें भगवान् शङ्कराचार्यने 'मायोपाधिर्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः' ( माया उपाधिसे युक्त ईश्वरके सर्वज्ञत्व आदि लक्षण हैं ) ऐसा कहा है ।
* दृष्टान्तका तात्पर्य यह है—राजकुलमें उत्पन्न हुआ कोई राजकुमार किसी कारणवश छोटी अवस्थासे ही व्याधके कुलमें रहा और अपनेको राजकुमार नहीं समझता था किन्तु मैं व्याधका अर्थात् एक निकृष्ट जातिका पुत्र हूँ ऐसा जानता था, इसी कारणसे कदाचित् यह अत्यन्त शूर या विजयी होनेपर भी लोकमें अपनी निकृष्ट जातीयताप्रयुक्त अपमानका अनुभव करता रहा, इस दशामें उसके वंशका परिज्ञान रखनेवाले किसीने उससे कहा कि तुम राजपुत्र हो व्याधके पुत्र नहीं हो, इससे-अपनी उत्कृष्ट जातिके स्मरणसे-हीन जातिप्रयुक्त अपमान आदिको भूलकर यह उत्तम जातिके सुखका जैसे अनुभव करने लगा, वैसे ही ब्रह्म भी अनादि अविद्याके प्रभावसे अपने स्वतः सिद्ध, नित्य और आनन्दरूप स्वभावको भूलकर जीवभावको प्राप्त हुआ है। और तज्जन्य