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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 147 of 590

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Page 147

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ११७


इत्युदाहृतसूत्रानन्तरसूत्रेण यथा सूर्यस्य रूपवतः प्रतिबिम्बोदययोग्यं ततो विप्रकृष्टदेशं रूपवज्जलं गृह्यते, नैवं सर्वगतस्याऽऽत्मनः प्रतिबिम्बोदययोग्यं किञ्चिदस्ति ततो विप्रकृष्टमिति प्रतिबिम्वासम्भवमुक्त्वा 'वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० २०) इति तदनन्तरसूत्रेण यथा जलप्रतिबिम्बितः सूर्यो जलवृद्धौ वर्धते इव, जलह्रासे ह्रसतीव, जलचलने चलतीवेति तस्याऽऽध्यासिकं जलानुरोधिवृद्धिह्रासादिभाक्त्वम्, तथा आत्मनोऽन्तःकरणादिनाऽवच्छेदेन उपाध्यन्त-


सूत्रसे—'जैसे रूपवान् सूर्यके प्रतिबिम्बके योग्य स्वच्छ और सूर्यसे दूरदेशमें रहनेवाला रूपवान् जल उपलब्ध होता है, वैसे सर्वगत आत्माके प्रतिबिम्बके योग्य और आत्मासे दूरदेशवर्ती कोई वस्तु उपलब्ध नहीं होती' इस प्रकार प्रतिबिम्बका असम्भव कहकर 'वृद्धिह्रासभाक्त्वम्' इत्यादि अनन्तर पठित सूत्रसे—'जैसे जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य जलकी वृद्धि होनेपर बढ़ता-सा है, जलके कम होनेपर छोटा-सा होता है और जलके चलनेसे जलप्रतिबिम्बित सूर्य मानो चलता है, इस प्रकार सूर्यमें जलके सम्बन्धसे आध्यासिक वृद्धि और ह्रास आदिकी प्रतीति होती है, वैसे ही चिदात्माके अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न होनेके कारण (उसके) बुद्धि आदि उपाधिमें


नहीं घट सकता है, तो श्रुतिमें कहे गये 'जलचन्द्रवत्' या 'जलसूर्यवत्' इत्यादि दृष्टान्तोंकी असङ्गति होगी, नहीं, असङ्गति नहीं होगी, कारण कि यद्यपि दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकका प्रतिबिम्बितत्वरूपसे साम्य नहीं है, तथापि वृद्धि, ह्रास आदिसे अन्य सादृश्य होनेसे दृष्टान्तकी उपपत्ति-सङ्गति हो सकती है। इसी उपपत्तिका मूलमें 'वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यम्' इस सूत्रसे उल्लेख किया गया है। यद्यपि मूलमें ही सूत्रका अर्थ किया गया है, तथापि विशेषरूपसे स्फुट होनेके लिए फिर सुन लीजिये—विशाल जलसमुदायमें यदि सूर्यका प्रतिबिम्ब पड़े, तो वह बहुत बड़ा दीखता है, क्षुद्रपात्रस्थित जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य क्षुद्रसा भासता है, जलके हिलनेसे सूर्यका भी हिलना-चलना मालूम होता है, वैसे ही आत्मा भी अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न है, अतः उसकी अन्तःकरण आदिके अभ्यन्तर सत्ता है, इसलिए हाथी आदि विशालकाय जीवोंके अन्तःकरण आदि उपाधियोंके विशाल होनेसे आत्मा विशाल मालूम होता है और मच्छर आदि क्षुद्र जीवोंके छोटे अन्तःकरणमें वह छोटा मालूम होता है अर्थात् ह्रासित आत्मा ज्ञात होता है। अन्तःकरण आदिके गतिमान् होनेसे वह चलता-सा मालूम होता है। वस्तुतः न तो वह बड़ा है, न छोटा है और न चलता है। इसीलिए 'ध्यायतीव, लेलायतीव' (बुद्धिके ध्यान करनेपर आत्मा मानो ध्यान करता है, चलनेपर मानो आत्मा भी चलता है, ऐसा प्रतीत होता है)। अतः दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिककी इसी रूपसे सङ्गति है, इसलिए दृष्टान्त-वाक्य अनुपपन्न नहीं हैं और उनका तात्पर्य प्रतिबिम्बवादमें नहीं है।