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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 145 of 590

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Page 145

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषाअनुवादसहितं ११५


त्वमित्येवं कृतहानादिदोषापनुत्तये वस्तुतो जीवैक्यस्य शरणीकरणीयत्वेन तन्न्यायादन्तःकरणोपाधिपक्षेऽपि वस्तुतश्चैतन्यैक्यस्य तदवच्छेदकोपाध्यैक्यस्य च तन्नत्वाभ्युपगमेन तद्दोषनिराकरणसम्भवाच्च । न चाऽवच्छेदपक्षे 'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन् । उपाधिना


प्रतिबिम्बो जीवः' इस पक्षमें भी ब्राह्मण आदि शरीरगत अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशमें कर्तृत्व और देव आदि शरीरगत अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशमें भोक्तृता है, इस प्रकार प्रदेश-भेद होनेपर भी कृतहान आदि दोषका निराकरण करनेके लिए अगत्या प्रतिबिम्बवादियोंको एकजीववादपक्षका अङ्गीकार करना होगा, अतः इसी न्यायके आधारपर अन्तःकरणोपाधिपक्षमें भी (अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य जीव है, इस पक्षमें भी अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य-प्रदेशके भिन्न होनेपर भी ) वास्तवमें चैतन्यकी एकता और चैतन्यकी अवच्छेदक उपाधिकी एकताको प्रयोजक माननेसे कृतहान आदि दोषोंका निराकरण भी * हो सकता है । परन्तु अवच्छेदपक्षमें—'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा०'


होनेमें कोई विशेष नहीं है । जैसे सुवर्ण और लोहके भेदसे शृङ्खलात्वमें कोई विशेषता नहीं होती, वैसे ही भावाभावके व्यावर्तकत्वमें विशेषता नहीं है । वेदान्तोंकी अतद्व्यावृत्ति और विधिमुखसे द्विधा प्रवृत्ति होती है, ऐसा आचार्योंका सम्मत पक्ष है। अतद्व्यावृत्ति—तत् शब्दसे ब्रह्मका परिग्रह होता है, अतत् शब्दसे ब्रह्मभिन्न अन्तःकरण आदिका, उनकी व्यावृत्तिरूपसे ब्रह्मका बोध होता है और बुद्धिका साक्षी, मनका साक्षी, इस प्रकार विधिमुखसे भी ब्रह्मका बोध होता है । इस परिस्थितिमें प्रतिबिम्ब और अवच्छेद दोनों वादोंमें अन्तर्यामी ब्राह्मणकी उपपत्ति और अनुपपत्तिके समान होनेपर 'सुतरां नीरूपे' इत्यादिसे नीरूप अन्तःकरण आदिमें चैतन्यके प्रतिबिम्बके असंभवका प्रतिपादन होनेसे अवच्छेदपक्ष ही आदरणीय है, प्रतिबिम्बपक्ष आदरणीय नहीं है।


* तात्पर्य यह है कि वस्तुतः चैतन्य यदि एक है, तो अन्य जीव द्वारा किये गये कर्मोंके फलका भोग अन्यको होगा, यह आपत्ति देना युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदवादियोंके मतमें एक अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य एक जीव है और अन्य अन्तःकरणसे अवच्छिन्न अन्य जीव है इस प्रकारका अभ्युपगम होनेसे अन्तःकरणोंके भिन्न-भिन्न होनेसे जीवान्तर-कृत कर्मोंका जीवान्तरोंसे भोग नहीं हो सकता है, इसी रहस्यको ग्रन्थकारने ( तदवच्छेदकोपाधि ) इस शब्दसे प्रकट किया है। इस अवच्छेदपक्षमें पूर्वकथनानुसार अन्तःकरणके अभावसे युक्त चैतन्य—अन्तःकरणाभावावच्छिन्न चैतन्य—ईश्वर है अथवा 'कारणोपाधिरीश्वरः' इस श्रुतिके अनुरोधसे अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसा समझना चाहिए ।