सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context११२ सिद्धान्तलेशसंग्रह - [ प्रथम परिच्छेद
भावेनावच्छेदात् तदवच्छेदरहितचैतन्यरूपस्येश्वरस्याऽण्डाद् बहिरेव सत्त्वं
स्यादिति ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्’ इत्यादावन्तर्यामिभावेन विकारान्तर-
वस्थानश्रवणं विरुध्येत । प्रतिबिम्बपक्षे तु जलगतस्वाभाविकाकाशे सत्येव
प्रतिबिम्बाकाशदर्शनात् एकत्र द्विगुणीकृत्य वृत्तिरुपपद्यते इति वाच्यम् ।
यतः प्रतिबिम्बपक्षेऽप्युपाधावनन्तर्गतस्यैव चैतन्यस्य तत्र प्रतिबिम्बो
वाच्यः, न तु जलचन्द्रन्यायेन कृत्स्नप्रतिबिम्बः । तदन्तर्गतभागस्य तत्र
प्रतिबिम्बासम्भवात् । नहि मेघावच्छिन्नस्याऽऽकाशस्याऽऽलोकस्य वा जले
प्रतिबिम्बवत् जलान्तर्गतस्याऽपि तत्र प्रतिबिम्बो दृश्यते । न वा मुखादीनां
बहिःस्थितिसमये इव जलान्तर्निमज्जनेऽपि प्रतिबिम्बोऽस्ति । अतो जलप्रति-
अवच्छिन्न होनेसे जीवभावापन्न ही है, अतः अन्तःकरणरूप उपाधिसे रहित
ईश्वररूप चैतन्यका ब्रह्माण्डसे अन्यत्र ही अवस्थान प्राप्त होगा, इस
परिस्थितिमें ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्’ (जो जीवमें रहता हुआ) इत्यादि श्रुतिमें
अन्तर्यामिभावसे ईश्वरका विकारोंके अन्दर जो अवस्थानका श्रवण है, वह विरुद्ध
होगा, इसलिए अवच्छेदवाद मानना युक्त नहीं है, प्रत्युत प्रतिबिम्ब पक्ष ही
मानना युक्त है, क्योंकि प्रतिबिम्ब पक्षमें तो जलके अन्दर वस्तुतः स्वाभाविक
आकाशके रहते ही आकाशप्रतिबिम्ब देखा जाता है, इसलिए प्रकृतमें भी एक
ही उपाधिमें प्रतिबिम्बभूत जीवभावसे और तत्तत् उपाधिके अन्तर्यामिभावसे
वृत्ति—अवस्थिति उपपन्न हो सकती है, अतः अवच्छेदवाद अयुक्त है । इस
प्रकारकी यदि कोई शङ्का करे, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्ब पक्षमें भी उसी
चैतन्यका उपाधिमें प्रतिबिम्ब मानना चाहिए, जिसका उपाधिमें अवस्थान
नहीं है अर्थात् जो चैतन्य उपाधिके अन्तर्गत नहीं है । जलचन्द्रके दृष्टान्तसे
सम्पूर्णका प्रतिबिम्ब नहीं मानना चाहिए । उपाधिके अन्तर्गत भागका उस
उपाधिमें प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता है, क्योंकि मेघावच्छिन्न आकाश अथवा
आलोकका जैसे जलमें प्रतिबिम्ब होता है, वैसे जलान्तर्गत आकाशका या
आलोकका जलमें प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता है। अथवा जलसे बाहर जब मुखकी
अवस्थिति रहती है, तब जैसे मुखका जलमें प्रतिबिम्ब होता है, वैसे
जलके भीतर मज्जन समयमें उस जलमें मुखका प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता
है, इससे—अर्थात् कथित दृष्टान्तोंसे यह सिद्ध हुआ कि उपाधिमें अनन्तर्गत