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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 140 of 590

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Page 140
११०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

ध्वनौ वर्णप्रतिबिम्बत्ववादोऽप्ययुक्तः, व्यञ्जकतया सन्निधानमात्रेण ध्वनिधर्माणांमुदात्तादिस्वराणां वर्णेष्कारोपोपपत्तेः ध्वनेर्वर्णप्रतिबिम्बग्राहित्वकल्पनाया निष्प्रमाणकत्वात् ।

प्रतिध्वनिरपि न पूर्वशब्दप्रतिबिम्बः, पञ्चीकरणप्रक्रियया पटहपयो-

ध्वनि वर्णोंका प्रतिबिम्ब है, यह वाद भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वनिके, जो सन्निधिमात्रसे वर्णोंका व्यञ्जक है, धर्मभूत उदात्त आदि स्वरोंके वर्णोंमें आरोपमात्रसे उपपत्ति हो सकती है, तो फिर ध्वनिमें वर्णप्रतिबिम्बकी ग्राहिता है, इस प्रकारकी कल्पना प्रमाणशून्य है। [ भाव यह है कि ह्रस्वत्व, दीर्घत्व आदि जो धर्म हैं, वे वस्तुतः ध्वनिके ही हैं; परन्तु उनका वर्णोंमें (अकार आदिमें ) आरोप किया जाता है, उनका आरोप तभी हो सकता है, जब ध्वनिको वर्णोंका प्रतिबिम्ब माना जाय। प्रतिबिम्बके स्वीकार करनेसे जैसे दर्पणमें रहनेवाला मालिन्य प्रतिबिम्ब द्वारा मुखमें आरोपित होता है, वैसे ही ध्वनिमें रहनेवाले ह्रस्वत्व आदिका प्रतिबिम्ब द्वारा बिम्बभूत वर्णोंमें आरोप होगा, इस परिस्थितिमें नीरूप ध्वनिमें नीरूप वर्णोंका प्रतिबिम्ब मानना ही पड़ेगा, इस प्रणालीसे नीरूप अन्तःकरणमें नीरूप आत्माका प्रतिबिम्ब क्यों न माना जाय, इसका समाधान इस रीतिसे दिया गया है कि वर्णोंका प्रतिबिम्ब माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु व्यञ्जक ध्वनिके सामीप्यमात्रसे ध्वनिमें रहनेवाले ह्रस्वत्व आदिका वर्णोंमें आरोप होता है, जैसे जपाकुसुमके सामीप्यसे रक्तत्वका स्फटिकमें आरोप होता है, अतः वर्णप्रतिबिम्बका स्वीकार न करनेसे इस दृष्टान्तसे अन्तःकरणमें आत्मप्रतिबिम्बका अभ्युपगम नहीं हो सकता ]।

* प्रतिध्वनि भी पूर्वशब्दका प्रतिबिम्ब नहीं है, क्योंकि पञ्ची-


प्रतिबिम्बमें गगनप्रतिबिम्बत्वं भ्रम माननेपर भी उस भ्रमके विषयीभूत गगनप्रतिबिम्बको अनिर्वचनीय मानना होगा, अतः गौरव समान ही है और अनुभवानुसारी गौरव दोषावह नहीं होता, इसलिए रूपवान्का ही प्रतिबिम्ब होता है, इस नियममें गगनमें व्यभिचार दुर्वार है। तथापि चैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं होता है, क्योंकि नीरूप अन्तःकरण प्रतिबिम्बकी उपाधि नहीं हो सकती है, यह रहस्य है।

* भाव यह है कि पटह आदि वायसे उत्पन्न शब्दस्थलमें पाषाणविशेष आदिके समीपवर्ती आकाशप्रदेशमें प्रतिध्वनि सुनी जाती है। वह पूर्व शब्दका प्रतिबिम्ब है, मुख्य ध्वनि

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