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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 138 of 590

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Page 138

१०८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


प्रतिबिम्बभावापगमेऽपि स्वरूपं न विनश्यतीत्येतत्परम्, न तदतिरिक्तकूटस्थनामकचैतन्यान्तरपरम् । जीवोपाधिना अन्तःकरणादिनाऽवच्छिन्नं चैतन्यं बिम्बभूत ईश्वर एव । 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' इत्यादिश्रुत्या ईश्वरस्यैव जीवसन्निधानेन तदन्तर्यामिभावेन विकारान्तरावस्थानश्रवणादिति ।

घटसंवृतमित्यादिश्रुतिस्मृतिसमाश्रयात् ।
अन्येऽन्तःकरणेनावच्छिन्नं जीवं वभाषिरे ॥ ४१ ॥

कुछ लोग 'घटसंवृतम्' इत्यादि श्रुति और स्मृतिके आधारपर अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य जीव है, ऐसा कहते हैं ॥४१॥

अन्ये तु—रूपानुपहितप्रतिबिम्बो न युक्तः सुतरां नीरूपे । गगन-


अपगम होनेपर भी जीवका स्वरूप नष्ट नहीं होता, यह बोध कराती है । जीवसे अतिरिक्त कूटस्थ चैतन्यका बोध नहीं कराती । जीवकी उपाधि—अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न बिम्बभूत चैतन्य ही ईश्वर है, क्योंकि * 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' ( जो विज्ञानमें रहता हुआ ) इत्यादि श्रुतिसे जीवके सन्निधानसे उसके अन्तर्यामी रूपसे विकारोंके भीतर ईश्वरके ही अवस्थानका श्रवण है ।

कुछ लोग अवच्छिन्न पक्षको ही रुचिकर मानते हैं, क्योंकि रूपरहित पदार्थका प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता, नीरूप अन्तःकरण आदिमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब होना सुतरां असम्भव है । [ भाव यह है कि पूर्व ग्रन्थसे मतभेदके साथ


* इसमें आदिशब्दसे 'विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयति' इत्यादि वाक्यका ग्रहण है । यहांपर विज्ञानशब्दका अर्थ है—जीव अर्थात् जो जीवके अन्दर रहकर जीवका अभ्यन्तर है, जिसको जीव नहीं जानता है, जिसका जीव शरीर है और जो जीवका नियमन करता है । इससे ईश्वरमें जीव आदिकी नियन्तृता स्पष्टरूपसे भासती है, और जैसे दूरस्थ राजा प्रजाका नियन्त्रण करता है, वह वैसे नियन्त्रण नहीं करता, किन्तु जीवके सान्निध्यसे ही नियन्त्रण करता है, यह भाव है । यह अन्तर्यामिब्राह्मण स्मृतिका भी उपलक्षण है, इससे—

'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥' [ गीता १८ श्लोक ६१ ]

इस स्मृतिका ग्रहण होता है—हे अर्जुन, शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ होकर प्राणियोंको अपनी मायासे भ्रमण कराता हुआ सम्पूर्ण भूतोंके हृद्देशमें ईश्वर रहता है । इससे ईश्वरमें मायाप्रयुक्त नियन्तृत्व है, यह ज्ञात होता है ।