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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 116 of 590

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Page 116

८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


परत्र च जीवभावेनावच्छेद्यचैतन्यप्रदेशस्य भेदेन कृतहानाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । प्रतिबिम्बस्तूपाधेर्गतागतयोरवच्छेद्यवन्न भिद्यते इति प्रतिबिम्बपक्षे नायं दोष इत्युक्तम् ।

एवमुक्तेष्वेतेषु जीवेश्वरयोः प्रतिबिम्बविशेषत्वपक्षेषु यत् बिम्बस्थानीयं ब्रह्म तत् मुक्तप्राप्यं शुद्धचैतन्यम् ।

घटाभ्रवारिणोर्व्योम्नः प्रतिबिम्बाविवात्मनः ।
बुद्धितद्वासनाभासौ जीवेशौ, बुद्धयुपाधिकः ॥ ३३ ॥
कूटस्थः शुद्धचित् ब्रह्म चित्रदीपे चतुर्विधम् ।
कूटस्थे कल्पितो जीवः शुद्धे ब्रह्मणि चेश्वरः ।
अहं ब्रह्मेति बाधायामैक्यमित्यपि तन्मतम् ॥ ३४ ॥

घटके जल और मेघके जलमें जैसे आकाशके प्रतिबिम्ब हैं, वैसे ही बुद्धि—अन्तःकरण और उसकी वासनाओंमें चैतन्यके आभास क्रमशः जीव और ईश हैं, बुद्धयुपाधिक—स्थूल सूक्ष्म शरीरोंमें अधिष्ठानरूपसे वर्तमान कूटस्थ चैतन्य है अर्थात् कूटके अयोग्धनके समान निश्चलरूपसे रहनेवाला चैतन्य है और सब उपाधियोंसे रहित शुद्ध चैतन्य ब्रह्म है, इस प्रकार चैतन्यके चार भेद चित्रदीपमें हैं। और कूटस्थमें कल्पित जीव है, शुद्धब्रह्ममें कल्पित ईश्वर है और 'अहं ब्रह्मास्मि' ( मैं ब्रह्म हूं ) यह बाधमें सामानाधिकरण्य है, यह भी उसका मत है ॥३३॥३४॥


हो सकता है, तो अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही जीव हो, अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित चैतन्यको जीव क्यों माना जाता है ? नहीं यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि इस लोकमें और परलोकमें अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशका भेद होनेसे कृतहान और अकृताभ्यागमका प्रसङ्ग आवेगा । प्रतिबिम्ब तो उपाधिके गमनमें या आगमनमें भी भिन्न नहीं होता है, इसलिए यह दोष प्रतिबिम्ब पक्षमें नहीं है ।

[ जैसे चन्द्र आदि प्रतिबिम्बसे युक्त जलपात्रोंमें से एकके विनाश होनेपर उसमें वृत्तिरूपसे प्रकाशित प्रतिबिम्बका बिम्बके साथ एकीभाव देखा जाता है, अन्य प्रतिबिम्बका एकीभाव नहीं देखा जाता, इसी प्रकार प्रतिबिम्बरूप जीवका भी विदेहकैवल्य समयमें बिम्बभूत शुद्ध ब्रह्मके साथ एकीभाव होगा प्रतिबिम्बभूत ईश्वरके साथ नहीं होगा, क्योंकि प्रत्यक्ष विरोध है, इस प्रकार आशङ्का करके


इस मतमें माया और अविद्या पर्याय है, विशुद्धसत्त्व माया है और अविशुद्धसत्त्व अविद्या है यह भेद नहीं है, इससे मायाका मायाकार्य अन्तःकरण अर्थ करनेमें और अविद्याको ईशकी उपाधि माननेमें कोई हानि नहीं है यह भाव है ।