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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 111 of 590

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Page 111

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८१


क ईश्वरोऽथ को जीवः ? प्रकटार्थकृतो विदुः ।
ईशं मायाचिदाभासं जीवमाविद्यकं च तम् ॥ २८ ॥
अनादिर्विश्वप्रकृतिर्माया चिन्मात्रसंश्रया ।
तदेकदेशोऽविद्या तु विक्षेपावरणान्विता ॥ २९ ॥

ईश्वर कौन है और जीव कौन है ? इस प्रकारकी विप्रतिपत्तिमें प्रकटार्थकार कहते हैं कि मायामें चैतन्यका जो आभास है, वह ईश्वर है और अविद्यामें चैतन्यका जो आभास है, वह जीव है । अनादि विश्वकी प्रकृति और चिन्मात्रमें रहनेवाली माया है और उस मायाका आवरण-विक्षेपशक्तियुक्त एकदेश अविद्या है ॥ २८ ॥ २९ ॥

अथ क ईश्वरः को वा जीवः ? अत्रोक्तं प्रकटार्थविवरणे—

[ पूर्वग्रन्थमें जगत्के उपादान ईश्वरका और ‘जीवाश्रित माया’ इस वाक्यमें जीवका कथन हुआ है, अतः प्रसङ्गसे या उपोद्घात सङ्गतिसे ईश्वर और जीवके स्वरूपका निर्णय करनेके लिए प्रश्न करते हैं— ] ईश्वर कौन है और जीव कौन है ? अर्थात् ईश्वर और जीवका क्या लक्षण है । इस परिस्थितिमें प्रकटार्थ-


ब्रह्म सर्वानुभूः' इति श्रुतेः । कथं तर्हि ब्रह्मणो जगत्कारणत्वं श्रुतौ प्रसिद्धम् ? जगत्कारणाधिष्ठानत्वेन कारणत्वोपचारात् । ब्रह्मकारणश्रुतेरन्यार्थत्वाच्च—'एकमेवाद्वितीयमिति श्रुतेः अद्वितीयत्वं तावद् ब्रह्मणः सिद्धं तत्कथं सम्भाव्यतामिति कार्यकारणयोः अभेदस्तावल्लोकप्रसिद्धः······ अज्ञानं कारणमिति अविदितत्वाच्च । साथ ही साथ इनका सारांश भी सुन लीजिए—ब्रह्माज्ञानसे अर्थात् अज्ञानसे ही जगत्की उत्पत्ति होती है, क्योंकि ब्रह्म अविकारी होनेसे कारण नहीं हो सकता, यदि ब्रह्ममें कारणत्वव्यवहार होता है, तो केवल जगत्की उपादान मायाके आश्रय होनेसे होता है, वस्तुतः किसी प्रकारका कारणत्व उसमें है ही नहीं । इसलिए ‘विमत अनिर्वचनीय है, दृश्यत्व होनेसे, इत्यादि दृश्यत्वहेतुसे अनुमानसे सिद्ध अनिर्वचनीय जगत्की अनादि अनिर्वचनीय अविद्या ही कारण है, ब्रह्म नहीं, क्योंकि ‘तदेतद् ब्रह्मापूर्वम्०’ ( अज्ञान आदिका विषय जगत् ब्रह्म ही है अर्थात् जगत्का स्वरूप ब्रह्मसे अन्य नहीं है, वह ब्रह्म कारण और कार्य रहित है, तथा अव्याकृताननुगत है.) इत्यादि श्रुतियोंसे कूटस्थ ब्रह्ममें कारणत्वका निषेध किया गया है । कहींपर श्रुतिमें ब्रह्मकी जगत्कारणता जो प्रसिद्ध है, वह जगत्कारण मायाके अधिष्ठान होनेसे उपचारमात्रसे है और ब्रह्ममें कारणत्वप्रतिपादक श्रुतिका प्रयोजन ‘ब्रह्म कारण है’ इस अर्थका प्रतिपादन करना नहीं है, परन्तु अन्य है अर्थात् ‘एकमेवाद्वितीयम्’ ( एक ही अद्वितीय ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतिसे ‘ब्रह्म अद्वितीय है’ ऐसा सिद्ध होता है । परन्तु इसका सम्भव कैसे हो सकता है, इस प्रकार असम्भावनाके प्राप्त होनेपर लोकप्रसिद्ध कार्यकारणके अभेदके अनुसार उक्त असम्भावनाकी निवृत्ति करना ही कारणत्वबोधक श्रुतिका तात्पर्य है, अतः अज्ञान ही कारण है ।

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