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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

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आवश्यक होता है। इससे अनेक उदरसम्बन्धी रोग दूर होते हैं तथा सहज रूप से
मूलबन्ध और उड्डियान बन्ध के अभ्यास का फल प्राप्त होता है, कुण्डलिनी शक्ति
ऊर्ध्वमुखी होती है और प्राणायाम की साधना संयत होती है।
चतुर्थं मेढ्राधारं लिङ्गसंकोचनेन ब्रह्मग्रन्थित्रयं भित्त्वा
भ्रमरगुहायां विश्रम्य तत ऊर्ध्वमुखे विन्दुस्तम्भनं भवति । एषा
वज्रोली प्रसिद्धा ॥ १३ ॥
चौथा मेढ़ ( लिंग )—आधार है। यहाँ लिंग का संकोचन कर ( योनि
मुद्रा की सहायता से ) वीर्य को ऊर्ध्वगामी करते हुए योगी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र—
तीन ग्रन्थियों का भेदन कर (मेरुदण्ड के सामने ग्रीवा के ऊपरी भाग में विद्यमान)
भ्रमर गुफा में वीर्य का स्तम्भन कर विश्राम करता है। ( वीर्य अधः पतित नहीं
होने पाता है।) यही वज्रोली क्रिया है। ( इसके प्रभाव से योगी अखण्ड ब्रह्म-
चर्य में स्थित होकर प्राण, मन और वीर्य—बिन्दु का पारस्परिक लय कर परम
पद में स्वस्थ हो जाता है।) यह वज्रोली क्रिया विशेष रूप से प्रसिद्ध
है ॥ १३ ॥
विशेष—योनि-मुद्रा के अभ्यास से सुप्त कुण्डलिनी शक्ति जाग कर ऊपर
उठती है और वीर्य ऊर्ध्वगामी होता है। इस योनि मुद्रा का विवरण महर्षि घेरण्ड
ने अपनी घेरण्डसंहिता में दिया है। सिद्धासन में स्थित होकर दोनों हाथ के अंगूठों
से कानों को, दोनों तर्जनी से नेत्रों को, मध्यमा से मुख को तथा अनामिका अंगुली
से नाक के छिद्र बन्द करना चाहिये। प्राण को काकीमुद्रा ( कौए की चोंच के
समान मुख को जिह्वा बाहर कर आकारित करना चाहिये और धीरे-धीरे वायु
का पान करना चाहिये।) से खींचकर अपान वायु से मिलाना चाहिये। देहस्थ
षट्चक्रों का ध्यान कर 'हूं' या 'हंस'—इन दोनों मन्त्रों से सुप्त कुण्डलिनी शक्ति
को जगाकर सहस्रार में स्थापित करना चाहिये । ऐसी भावना करनी चाहियेकि
मैं शिव के साथ शक्तिमय होकर परम सुख का आस्वादन कर रहा हूँ। यही
योनिमुद्रा है।
सिद्धासनं समासाद्य कर्णाचक्षुर्नासोमुखम् ।
अंगुष्ठतर्जनीमध्यानामाभिश्चैव साधयेत् ॥
काकोभिः प्राणं संकृष्य अपाने योजयेत् ततः।
५२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति