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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 82 of 222

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Page 82

यस्यस्मरणमात्रेण दृष्टादृष्टफलं लभेत् ॥
सिद्धिः पिनाकीयत्रास्ते काकिनी यत्र देवता ।
( शिवसंहिता ५ । १०६-१११ )
महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि इस ज्योतिपूर्ण कमल के मध्य में
शक्ति स्वयं को असाधारण रूप से भव्य, सुन्दर और स्थिर लिंगाकार प्रकाश के
रूप में प्रकट करती है। शिवरूपिणी—शिवालिंगन के आनन्द में मग्न कुण्डलिनी
के इस रूप को हंसकला कहा जाता है, इस हंसकला को श्रीशक्ति भी कहा जाता
है। योगी इसका ध्यान कर इन्द्रियजयी और शान्त हो जाता है। सिद्धियों की
प्राप्ति के प्रलोभन नष्ट हो जाते हैं और योगी अपनी जैविक अथवा मानसिक
शक्ति को इसमें केन्द्रित कर लेता है।
पञ्चमं कण्ठचक्रं चतुरङ्गुलं तत्र वाम इडा चन्द्रनाड़ी
दक्षिणे पिङ्गला सूर्यनाड़ी तन्मध्ये सुषुम्णां ध्यायेत् सैवानाहत-
कलाऽनाहतसिद्धिर्भवति ॥ ५ ॥
पांचवां चार अंगुल विस्तारवाला कण्ठ ( विशुद्ध ) चक्र है। वहाँ बायीं
ओर इडा-चन्द्रनाड़ी है और दाहिनी ओर पिंगला-सूर्यनाड़ी है। ( ये दोनों
नाडियाँ मूलकन्द से प्रकट होकर यहाँ आती हैं- निकलतो हैं।) इन दोनों
नाड़ियों के मध्य में ( श्वेत वर्ण की ) सुषुम्ना नाड़ी-ब्रह्म नाड़ी का ध्यान
करना चाहिये। यह ब्रह्मनाड़ी अनाहत कला कहलाती है, इसकी उपासना
( ध्यान ) से अनाहत सिद्धि—मानसिक संकल्पों की सिद्धि होती है, संकल्पशक्ति
सफल होती है ॥ ५ ॥
विशेष—कण्ठस्थान में दीपक की ज्योति के समान प्रभाववाले विशुद्ध चक्र में
नासा के अग्र भाग पर दृष्टि स्थिर कर आत्मा का ध्यान करने से साधक के समस्त
( आधिभौतिक, आधिदैहिक और आधिदैविक ) ताप-दुःख नष्ट हो जाते हैं।
सततं घण्टिकामध्ये विशुद्धे दीपकप्रभे।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा दुःखं विमुञ्चति ॥
( विवेकमार्तण्ड १७२ )
महायोगीन्द्र मत्स्येन्द्रनाथजी ने कण्ठचक्र को इष्ट के ध्यान का स्थान
कहा है।
४० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति