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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 44 of 222

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नास्ति सत्यविचारेऽस्मिन्नुत्पत्तिश्चाण्डपिण्डयोः ।
तथापि लोकवृत्त्यर्थं वक्ष्ये सत्सम्प्रदायतः ॥ २ ॥
यद्यपि इस ( स्वसंवेद्य ) सत्यविचार ( अलखनिरञ्जनपरमेश्वरपरमात्म-
परक सिद्धान्त ) में ब्रह्माण्ड ( अण्ड ) और व्यष्टि शरीर ( पिण्ड ) की उत्पत्ति
का निरूपण नहीं हो सकता, तथापि लोकव्यवहार को ध्यान में रख कर असत्वाद
के रूप में अण्डपिण्ड की उत्पत्ति का विवेचन करता हूँ ॥ २ ॥
विशेष—नाथयोग—सिद्धामृत मार्ग अथवा सिद्धमत में ही नहीं, वेदा-न्त
आदि दर्शनों से भी समस्त जगत् परमात्मस्वरूप स्वीकृत है, अतएव अण्ड
( ब्रह्माण्ड ) और पिण्ड ( शरीर आदि ) की उत्पत्ति सिद्ध ही नहीं होती, क्यों
कि कूटस्थ, असंग, अलख निरञ्जन आदिनाथ की सत्ता से अलग जगत् की सत्ता
ही नहीं है, यह अजातवाद है तथापि लोक में व्यवहार के लिये सत्कार्यवाद—
परिणामवाद का विवेचन किया गया है । प्रकृति का परिणाम ही संसार है, इसी
मायिक—मिथ्याभासित संसार का सृजन और संहार ( विनाश ) होता
रहता है, आत्मा अपरिणामी है, सम्पूर्ण परमात्म स्वरूप, सच्चिदानन्दस्वरूप है,
एकरस, अखण्ड, नित्य और अमृतस्वरूप है । उसमें परिणामवाद अथवा रूपान्तर
या सत्कार्यवाद सिद्ध नहीं होता है । अलख निरञ्जन के साक्षात्कार के प्रकाश
में अजातवाद की ही महती प्रतिष्ठा है ।
सा पिण्डोत्पत्त्यादिः सिद्धमते सम्यक् प्रसिद्धा पिण्डोत्पत्तिः
पिण्डविचारः पिण्डसंवित्तिः पिण्डाधारः पिण्डपदसमरसभावः
श्रीनित्यावधूतः ॥ ३ ॥
सिद्धमत में अत्यन्त प्रसिद्ध—सिद्धों के अनुभव में प्रकाशित पिण्डोत्पत्त्यादि
पद्धति में पिण्ड की उत्पत्ति, पिण्डविचार, पिण्डसंवित्ति, पिण्डाधार ( शरीरस्थ
चक्र, आधार आदि ) पिण्डपदसमरसभाव और श्रीनित्यावधूत ( के स्वरूप )
का छः उपदेशों में ( इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति में ) वर्णन किया गया है ॥ ३ ॥
अव्यक्त-अनाम परब्रह्म
यदा नास्ति स्वयं कर्ता कारणं न कुलाकुलम् ।
अव्यक्तञ्च परं ब्रह्म अनामा विद्यते तदा ॥ ४ ॥
२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति