सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextसर्वव्यापक शून्य (व्योम) ही. उसका निवास है. अथवा वह ब्रह्म—अलख निरञ्जन
परमेश्वर में स्वशक्ति से स्वस्थ अथवा अधिष्ठित होता है। स्वप्रकाशमय—अखण्ड
अन्तर्ज्योतिरूप वन में ही समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध कर ब्रह्म का एकमात्र
चिन्तन करता है, इस तरह वह वानप्रस्थ है, केवल वन में हरिण की तरह निवास
करने से कोई वानप्रस्थ नहीं होता है। सर्वज्ञत्व-उपाधिसहित परमात्मा और
अल्पज्ञत्वउपाधिसहित जीवात्मा की निरुपाधि अखण्ड आत्मस्वरूप में अभेदता
की प्रतीति करनेवाला अवधूत योगी अपने समस्त संकल्प का ज्योतिःस्वरूप
आत्माः(परमात्मा) में न्यास कर देता है, वह संन्यासी कहा जाता है ।।३४-३७।।
मायाकर्मकलाजालमनिशं येन दण्डितम् ।
अचलो नगवद् भाति त्रिदण्डी सोऽभिधीयते । ३८ ।
एकं नानाविधाकारं चञ्चलन्तु सदा तु यत् ।
तच्चित्तं दण्डितं येन एकदण्डी स कथ्यते । ३९ ।
शुद्धं शान्तं निराकारं परानन्दं सदोदितम् ।
तं शिवं यो विजानाति शुद्ध शैवो भवेत्तु सः । ४० ।
सन्तापयति दीप्तानि स्वेन्द्रियाणि च यः सदा ।
तापसः स तु विज्ञेयो न च गोभस्मधारकः । ४१ ।
क्रियाजालं पशुं हत्वा पतित्वं पूर्णतां गतम् ।
यस्तिष्ठेत् पशुभावेन स वै पाशुपतो भवेत् । ४२ ।
संन्यास-आश्रम में बाँस के तीन दण्ड धारण करने वाला त्रिदण्डी
संन्यासी कहा जाता है, वह माया (अविद्या), कर्म (धर्म-अधर्म) और
कलाजाल (प्राणादि लिंग-शरीर) के बन्धनका तत्वज्ञान द्वारा:निवारण कर
देता है और अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में पर्वत के समान अचल—दृढ़ हो
जाता है, इस तरह योगी त्रिदण्डी कहलाता है, केवल बाँस के तीन दण्ड
(बाह्य संन्यास-चिह्न के रूप में) धारण करनेवाला त्रिदण्डी नहीं
होता। जो अनेक संकल्प-विकल्प में भ्रमित, अनेक राग-द्वेष आदि
वृत्तियों में चञ्चल रहता है, उस चित्त को नियन्त्रित—वश में करनेवाला
योगी ही एकदण्डी संन्यासी कहा जाता है। जो शुद्ध (गुणातीत, निर्विकार),
निराकार (अलख-निरञ्जन सर्वव्यापक), परमानन्द-स्वरूप, स्वप्रकाशित
(स्वसंवेद्य अखण्ड परब्रह्म) परमेश्वर (.शिव) को तत्वतः जान लेता है,
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