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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 189 of 222

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Page 189

सा वज्री भक्षिता येन सोऽवधूतोऽभिधीयते । १४ ।
आवर्तयति यः सम्यक् स्वस्वमध्ये स्वयं सदा ।
समत्वेन जगद् वेत्ति सोऽवधूतोऽभिधीयते । १५ ।
जो भेद, अभेद, द्वैत और अद्वैत से अतीत होकर द्वैताद्वैतविलक्षण
स्वसंवेद्य, अखण्ड ज्ञानस्वरूप आत्मरस के आस्वादन में तत्पर है और जागरण—
रागद्वेष भाव में पूर्ण वैराग्यभाव से तन्मय है अथवा सच्चिदानन्दस्वरूप में स्वस्थ
है, वह अवधूत कहा जाता है । जो देश-काल से अतीत सर्वव्यापक अपने ही में
असीम परमात्मा को प्राप्त कर लेता है और ( दूसरों की दृष्टि में ) एकान्त वास
में रहते हुए भी जो अपने स्वसंवेद्य स्वरूप में सब जगह विद्यमान है, वही अवधूत
कहा जाता है । जिसने पार्थिव—भौतिक शरीर को अमर—मृत्युरहित करने के लिये
( खेचरी मुद्रा की सिद्धि के द्वारा ) सहस्रार से द्रवित चन्द्रामृत का ( विपरीत
करणी से ) स्वयं पान कर लिया है अथवा जो पान कर लेता है, वह अवधूत कहा
जाता है । जिसने मल से दूषित वज्रनाड़ी को (प्राणायाम आदि की सिद्धि से) मल
रहित कर लिया है अथवा वज्रोली के अभ्यास द्वारा जिसने शरीर में वीर्य को
ऊर्ध्वमुख कर जीर्ण कर दिया है, पचा लिया है, वह अवधूत कहलाता है । जो
अपने आत्मस्वरूप में परमात्मा की अभेदानुभूति करता है अथवा आत्मा-परमात्मा
में सामरस्य की सिद्धि कर आत्मपद में प्रतिष्ठित हो जाता है, वही सर्वत्र व्यापक
योगी अवधूत कहा जाता है ॥ ११–१५ ॥
अवधूत की अवस्था ( स्थिति )
स्वात्मानमवगच्छेद्यः स्वात्मन्येवावतिष्ठते ।
अनुत्थानमयः सम्यक् सोऽवधूतोऽभिधीयते । १६ ।
अनुत्थाधारसम्पन्नः परविश्रान्तिपारगः ।
धृतिचिन्मयतत्वज्ञः सोऽवधूतोऽभिधीयते । १७ ।
अव्यक्तं व्यक्तमाधत्ते व्यक्तं सर्वं ग्रसत्यलम् ।
स सत्यं स्वान्तरे सन्न सोऽवधूतोऽभिधीयते । १८ ।
अवभासात्मको भासः प्रकाशे सुखसंस्थितः ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४७