सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextअविद्यादि पंच क्लेश के स्मरण से परे होकर जो योगी अपने स्वरूप को
इन पाँचों क्लेश के नाशरूप भस्म से समलंकृत करता है और आचार्य ( गुरु )
द्वारा निर्दिष्ट योगमार्ग में नित्य आरूढ—दृढ़ रहता है, वही अवधूत कहा
जाता है ।। ४ ।।
लोकमध्ये स्थिरासीनः समस्तकलनोज्झितः ।
कौपीनं खर्परोऽदैन्यं सोऽवधूतोऽभिधीयते । ५ ।
( अपने स्वरूप का स्मरण कराने वाले विभूतिरूप अलंकार से शोभित )
विषयप्रपञ्चरूप संसार ( लोक ) में अखण्ड आत्मस्वरूप में दृढ़भाव से स्थित
रहनेवाला, समस्त संकल्पविकल्परूप भेद-भाव से विमुक्त, कटि में ( वस्त्ररूप )
केवल मात्र कौपीन, हाथ में ( जल पीने के लिये तथा भिक्षा-ग्रहण के उद्देश्य से )
खर्पर मात्र धारण कर ( लोक में ) दैन्यरहित—सर्वसमर्थ रूप में विचरण करने
वाला अभय योगी ही अवधूत कहलाता है ।। ५ ।।
अवधूत के वेष और चिह्न
शं सुखं खं परं ब्रह्म शङ्खं सङ्घट्टनाद् भवेत् ।
सिद्धान्तो धारितो येन सोऽवधूतोऽभिधीयते । ६ ।
'शं' शब्द सुख ( लोककल्याण ) का वाचक है और 'ख' शब्द ( अपने
अखण्ड ज्ञानस्वरूप-परमात्मा ) परब्रह्म का वाचक है ।। दोनों के मेल—ऐक्य
अथवा योग से 'शंख' शब्द सिद्ध होता है । अपने आत्मस्वरूप में स्थित होकर
अपने ज्ञानरूप उपदेशामृत और योगसाधन से जगत् के प्राणियों को सन्मार्ग पर
लगा कर उनका कल्याण सम्पादन करने वाला ही अवधूत है । वह शंख धारण
करता है —यही सिद्धान्त है । ( शंख को बाह्य चिह्न भी परिलक्षित किया जा
सकता है ।) अतएव शंख धारण करने वाला अवधूत कहा जाता है ।। ६ ।।
पादुका पदसंवित्तिर्मृगत्वक् स्यादनाहता ।
शेली यस्य परासंवित् सोऽवधूतोऽभिधीयते । ७ ।
मेखला निवृत्तिर्नित्यं स्वस्वरूपं कटासनम् ।
निवृत्तिः षड्विकारेभ्यः सोऽवधूतोऽभिधीयते । ८ ।
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