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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

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सदुपदेश प्रदान करता है। इस तरह चैतन्यस्वरूप में विश्रान्ति के फलस्वरूप
परमपद प्रस्फुटित प्रकाशित—होता है और शिष्य ( गुरु के अनुग्रहसे ) अखण्ड
अनन्त, अलख-निरञ्जन परमशिव का साक्षात्कार करता है ॥ ७१ ॥
अतएव महासिद्धानां मते प्रोक्तं वाङ्मात्रेण
सम्यगवलोकनेन वा तत्क्षणान्मुहुर्विश्रान्तियुक्तं करोतीति
यः स सद्गुरुर्भवति । नोचेन्निजविश्रान्ति विना पिण्डपदयोः
समरसकरणं न भवतोति सिद्धान्तस्तस्मान्निजविश्रान्तिकारकः
सद्गुरुरभिधीयते नान्यः । पुनर्वागादिशास्त्रदृष्ट्यनुमानतर्क
मुद्रया भ्रामको गुरुस्त्याज्यः ॥ ७२ ॥
योगज्ञान में सन्निष्ठ महासिद्धों के मत में कहा गया है कि केवल
सदुपदेशमात्र से अथवा कृपामय कटाक्षपात से तत्काल ही सद्गुरु अपने शिष्य
को स्वरूपावस्थिति—परमात्मनिष्ठा से संयुक्त कर देता है, अन्यथा बिना
परमात्मनिष्ठा के पिण्डपद ( व्यष्टिशरीर में व्याप्त अखण्ड ज्ञानस्वरूप
आत्मा और सकल ब्रह्माण्ड में व्याप्त परमात्मा ) से सामरस्य—अभेदतानुभूति
सम्भव ही नहीं है, यह सिद्धान्त है । अतएव जो स्वरूपावस्थिति--परमात्मनिष्ठा
( निजविश्रान्ति ) से शिष्य को कृतार्थ कर देता है, वही सद्गुरु कहलाता है ।
वाग्जाल—शास्त्र की दृष्टि से तर्क, अनुमान आदि मुद्रा से भ्रमित कर शिष्य को
सांसारिक विषय-प्रपञ्च में व्यामोहित करनेवाले गुरु का त्याग कर देना चाहिये,
ऐसा गुरु निजस्वरूपस्थिति नहीं प्रदान कर सकता है ॥ ७२ ॥
ज्ञानहीनो गुरुस्त्याज्यो मिथ्यावादीविडम्बकः ।
स्वविश्रान्तिं न जानाति परेषां स करोति किम् ॥ ७३ ॥
जिसे योगविषयक ज्ञान नहीं है, जो शिष्यों को वाग्जाल में उलझा कर
उन्हें दिग्भ्रमित करता है, जो आत्मप्रवञ्चक ( विडम्बनायुक्त ) है, वह गुरु नहीं
है, वह त्याज्य है ( उससे दीक्षा नहीं ग्रहण करनी चाहिये ) । वह स्वयं जब
अपनी स्वरूपस्थिति—परमात्म निष्ठा से अनभिज्ञ है तो दूसरों को किस तरह
सन्मार्ग-दर्शन करा सकता है—आत्मज्ञान प्रदान कर सकता है ॥ ७३ ॥
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