सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextऔर उस परमपदरूप में अपने व्यष्टि-पिण्ड में व्याप्त आत्मा का सामरस्य—
ऐक्य स्थापित कर उस अद्वैत स्वरूप में सच्चिदानन्दघन अखण्ड परमात्मा में
स्थित हो जाय । इस तरह परमपद में स्वरूपावस्था की प्रतिष्ठा से वह स्वयं
महासिद्ध—परमतत्वज्ञ योगी हो जाता है ।। ५६ ।।
न विधिर्नैव वर्णश्च न वर्ज्यावर्ज्यकल्पना ।
न भेदौनिधनं किञ्चिन्नाशौचं नोदकक्रिया ।। ५७ ।।
योगीश्वरेश्वरस्यैव नित्यतृप्तस्य योगिनः ।
वित्स्वात्मसुखविश्रान्तिभावलब्धस्य पुण्यतः ।। ५८ ।।
सम्यक्स्वभावविज्ञानात् क्रमाभ्यासान्नचासनात् !
न वैराग्यान्ननैराश्यान्नाहारात्प्राणधारणात् ।। ५६ ।।
न मुद्राधारणाद्योगान्मौनकर्मसमाश्रयात् ।
न विरक्तौ वृथायासान्न कायक्लेशधारणात् ।। ६० ।।
न देवार्चनाश्रयाद् भक्त्यानाश्रमाणाञ्च पालनात् ।
न षड्दर्शनकेशादिधारणान्न च मुण्डनात् ।। ६१ ।।
न जपान्न तपोध्यानान्न यज्ञतीर्थसेवनात् ।
नानन्तोपाययत्नेभ्यः प्राप्यते परम पदम् ।। ६२ ।।
योगीश्वर, आत्मस्वरूपानन्द में स्वस्थ योगी को मोक्षरूप स्वरूपावस्थिति
विश्रान्ति के पुण्य से आत्मस्वभावपरक सूक्ष्म ज्ञान से परमपद की प्राप्ति होती
है, उसके लिये विधि—शास्त्रनिर्दिष्ट नियमपालन, वर्ण की मर्यादा और संकल्प
(यह करना चाहिये, यह नहीं करना चाहिये ) अशौच, तर्पण-क्रिया, जन्म-
मरण के संस्कार आदि की आवश्यकता नहीं होती है । क्रमपूर्वक योगाभ्यास,
आसन, वैराग्य, अनासक्तिभाव (नैराश्य), आहार, प्राणायाम, मुद्रा-धारणा-
योग, मौन के अभ्यास, विशेष कर्म के आचरण, वैराग्य, व्यर्थ परिश्रम, शरीर को
उपवास आदि से संयमित करने, इष्ट देव की अर्चना, भक्ति और आश्रम धर्म के
पालन, छः दर्शन, केशादिधारण, मुण्डन, जप, तप, ध्यान, यज्ञ, तीर्थसेवन,
अनन्त-असंख्य उपायों से भी परमपद की प्राप्ति नहीं होती है ।। ५७-६२ ।।
एतानि साधनानि सर्वाणि दैहिकानि परित्यज्य परम-
पदेऽदैहिके स्थीयते सिद्धपुरुषैरिति ।। ६३ ।।
१३६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति