सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextमुख कर जगाया जाता है। ढके हुए सुषुम्ना द्वार को उद्घाटित कर यह ऊर्ध्व-
मुखी होती है। नाभिचक्र—मणिपूरक में आठवलयों वाली मध्य कुण्डलिनी की
स्थिति बतायी गयी है। यह बन्धत्रय—मूल, उड्डियान और जालन्धर बन्ध
के अभ्यास से समुत्थित होती है। प्राण से अपान का ऐक्य स्थापित होना
ऊर्ध्व शक्तिपात कहा गया है। शक्ति—कुण्डलिनी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ग्रंथि का
भेदन कर षट्चक्र से होती हुई सहस्रार में पहुँच जाती है, उस समय शून्य
समाधि की स्थिति में साधक अपने स्वरूप में समाहित हो जाता है।
एकैव सा मध्योर्ध्वाधः प्रभेदेन त्रिधा भिन्ना शक्तिरभि-
धीयते ॥ १७ ॥
यद्यपि कुण्डलिनी महाशक्ति स्वरूपतः एक ही है, तथापि (स्थान और
सूक्ष्मस्थूल भेद से) वह अधः, मध्य और ऊर्ध्व शक्ति के रूप में तीन प्रकार
की कही जाती है ॥ १७ ॥
विशेष—मूलाधार में रहनेवाली कुण्डलिनी सूक्ष्म, अबोधरूप और सबका
कारण कही जाती है। नाभि में मणिपूर चक्र में स्थित कुण्डलिनी बोधरूपा
कही जाती है और यही शक्ति जब ऊर्ध्वमुखी होकर ऊपर की ओर गति
करती है, तब बोधजनक कल्याणकारिणी ऊर्ध्व शक्ति के रूप में प्रसिद्ध
होती है।
बाह्येन्द्रियव्यापारनानाचिन्तामया सैवाधः शक्तिरि-
त्युच्यते । अतएव योगिनस्तस्या आकुञ्चने रता यस्या आकुञ्चनं
मूलाधारबन्धनात्सिद्धं स्यात् ॥ १८ ॥
बाह्य इन्द्रियजन्य कार्यों की चिन्ता का कारण अधः शक्ति—मूलाधार
में सुप्त कुण्डलिनी है। (जब तक इसको जगाया नहीं जाता है तब तक
साधक सांसारिक कार्यों की चिन्ता से ग्रस्त रहता है)। योगी मूलाधार में
स्थित इस शक्ति के आकुञ्चन—संकोचन में तत्पर रहते हैं। मूलाधार
बन्ध के अभ्यास (अपान और प्राण का ऐक्य स्थापित होने पर उड्डियान और
जालन्धर बन्ध की सिद्धि) से यह शक्ति ऊर्ध्वमुखी होकर जाग जाती है और
साधक को परमानन्द की प्राप्ति करा देती है ॥ १८ ॥
११२ .| [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति