सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
Page 152 of 222
Read in contextकर कुण्डलिनी शक्ति सोती है। वह वह्नियोग से जागृत होकर मन और प्राण
के साथ डोर में बँधी सूई के समान ऊपर उठती है। यह भुजङ्गाकृति कुण्डलिनी,
जो कमलतन्तु के समान विभासित और शुभ दीप्तियुक्त है, सुषुम्नामार्ग से वह्नि
के संयोग से ऊपर उठ जाती है और जिस तरह ताली से तालाबन्द दरवाजा
खोला जाता है, उसी तरह कुण्डलिनी महाशक्ति से योगी मोक्षद्वार का भेदन करता
है। इस कुण्डलिनी के जागरण की विधि का वर्णन है :
कृत्वा सम्पुटितौ करौ दृढतरं बद्धवा तु पद्मासनं
गाढं वक्षसि सन्निधाय चिबुकं ध्यात्वा च तत्प्रेरितम् ।
वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चारयेत्पूरितं
मुञ्चन् प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रबोधान्नरः ।
( गोरक्षशतक ५२ )
योगसाधक दोनों हाथों को एक-दूसरे से सटा कर पद्मासन में अच्छी
तरह स्थित होकर वक्षःस्थल पर चिबुक को लगा कर कुण्डलिनी का ध्यान करते
हुए बार-बार प्राणायाम द्वारा वायु खींच कर उसे अपानवायु से मिलाकर
कुम्भक द्वारा वायु को रोक कर श्वास बाहर निकालने से शक्ति के प्रबोधनद्वारा
अतुल बोध प्राप्त करता है ।
शिवसंहिता, घेरण्डसंहिता, हठयोगप्रदीपिका आदि में उपर्युक्त जागरण
विधि को शक्तिचालिनी मुद्रा नाम दिया गया है ।
विहाय निद्रां भुजगी स्वयमूर्ध्वं भवेत्खलु ।
( शिवसंहिता ४ । १०७ )
शक्तिचालन मुद्रा के अभ्यास से कुण्डलिनी जाग कर ऊपर की ओर गति
करती है ।
आकाशादि को कुण्डलिनी से उत्पत्ति
ऊर्ध्वमिति सर्वतत्त्वान्यपि स्वस्वरूपमेवेत्यूर्ध्वं वर्तते
अतएव सा विमर्शरूपिणी योगिनः स्वस्वरूपमवगच्छन्तीति
सुप्रसिद्धा ॥ १५ ॥
आकाश आदि समस्त भौतिक पदार्थ कुण्डलिनी शक्ति से ही उत्पन्न होते हैं,
( कार्यों की कारण से भिन्न सत्ता नहीं है ) समस्त प्रपञ्च कुण्डलिनीस्वरूप ही
११० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति