सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextविशेष—यह शक्ति निराभासा—सूर्यादि के प्रकाश से प्रकाशित होने वाली
नहीं है, स्वयं प्रकाशस्वरूपिणी है।
अनादिसंसिद्धं परमाद्वैतपरमेकमेवास्तीति याऽङ्गीकारं
करोति सा सत्ता ॥ ५ ॥
(पराशक्ति-कुलशक्ति के सत्ता-स्वरूप का लक्षण कहा जाता है।)
यह अनादि-सजातीय-विजातीय स्वगतभेदरहित है, संसिद्ध (स्वप्रकाश) परम
अद्वैत (विजातीय भेदरहित) और एक—(सजातीयत्व से परे) है। इस
तरह के अस्तित्व को स्वीकार करनेवाली सत्ता कहलाती है ॥ ५ ॥
अनादिनिधनोऽप्रमेयः स्वभावकिरणानन्दोऽहमस्मीत्यहं
सूचनशीला या सा पराऽहंता ॥ ६ ॥
कुल-(अवस्था-) शक्ति अपने अहंतारूप में आदि-अन्त से रहित और
अप्रमेय (इन्द्रियादि द्वारा अप्रत्यक्ष), स्वप्रकाशस्वरूप तथा सच्चिदानन्द
स्वरूपिणी (शिव में सम्पूर्ण कूटस्थ) है। यह अहंतारूप में शिव से अपनी
अभेदता प्रकट करती है। यह अहंतारूपी कुलशक्ति पराविद्या भी कही
जाती है ॥ ६ ॥
स्वानुभवचिच्चमत्कारनिरुत्थानदशां प्रस्फुटी करोति या
सा स्फुरता ॥ ७ ॥
कुलशक्ति अपने स्फुरतारूप में मन-वाणी से अगम अनुभवगम्य चैतन्य-
विलास की अद्वैतावस्था (द्वैताभासरहितता) अभिव्यक्त करती है, इसी कारण
यह स्फुरतारूपिणी प्रसिद्ध है ॥ ७ ॥
नित्यशुद्धबुद्धस्वरूपस्वयंप्रकाशत्वमाकलयतीति या सा
पराकलेत्युच्यते ॥ ८ ॥
कुलअवस्था में पराशक्ति कलरूपिणी कही जाती है। आत्मा शाश्वत-
सनातन, नित्य अविनाशी, (निर्विकार त्रिगुणातीत), निरञ्जन और स्वयं प्रकाश
है, बोधस्वरूप, स्वसंवेद्य अनुभवैकगम्य है—इस तरह आत्मतत्व की प्रकाशिका
शक्ति ही कला है ॥ ८ ॥
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