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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 107 of 222

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मस्तक के ऊपर का भाग गोल्लाट है। गोल्लाट के चल आकार का ध्यान
करना चाहिये अथवा मेरुदण्ड के सम्मुख ग्रीवा से ऊपर का स्थान भ्रमर
गुफा कहा जाता है। इस भ्रमरगुफा में लाल रंग के भ्रमर के आकार का ध्यान
करना चाहिये अथवा दोनों कानों के छिद्रों को दोनों तर्जनी अँगुलियों से यथाक्रम
आच्छादित (निरुद्ध) करना चाहिये, इससे सिर के मध्य भाग में धूं धूं कार
नाद (शब्द) का श्रवण होता है अथवा नेत्रों में नीली ज्योति वाली पुतली के
आकार का ध्यान करना चाहिये। यही अन्तर्लक्ष्य का निरूपण है ॥ २७ ॥
विशेष—गोल्लाट केन्द्र सहस्रार में ललाट के ठीक ऊपर है। इसमें एक
ज्योतिःपुंज प्रज्वलित है। इस पर मन को केन्द्रित करने से साधक की चेतना
दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठेगी, उसका व्यक्तित्व आध्यात्मिक ज्योति से
दिव्य हो जाता है। भ्रमर गुफा स्नायुदण्ड या रीढ़-संस्थान के ऊपर सहस्रार
के पृष्ठ भाग में स्थित है। इस स्थान में साधक अपने वीर्य को ऊर्ध्वगामी
कर सुरक्षित रखता है, इस भ्रमर गुफा में ध्यान केन्द्रित करने से योगसाधक
को काम, कामवासनायें और इन्द्रियों की उत्तेजनायें नहीं सताती हैं, वह शान्त,
स्थिर और मुक्त रहता है। इस केन्द्र में जीवन अथवा प्राणशक्ति को लाल रंग
के भ्रमर के आकार की तरह कल्पित कर ध्यान केन्द्रित कर दिव्य आनन्द का
अनुभव किया जाता है। योगी को अमृतत्व प्राप्त होता है, वह शिव-शक्ति
तादात्म्य अनुभव करता है। मस्तक के भीतर धूं धूं कार नाद पर ध्यान केन्द्रित
करने से यह नाद ओंकार का रूप ग्रहण कर लेता है, इस नाद के श्रवण के
फलस्वरूप योगी अलखनिरंजन का साक्षात्कार करता है। नेत्रों से आन्तरिक केन्द्र
में नीली ज्योति पर ध्यान केन्द्रित करने से योगसाधक की चेतना और व्यक्तित्व
में दिव्यता भर उठती है।
बहिर्लक्ष्यं कथ्यते नासाग्राद् बहिरङ्गुलद्वयमारक्तं
तेजस्तत्वं लक्षयेदथवा दशाङ्गुले कल्लोलवदप्तत्वं लक्षयेदथवा
नासाग्रद् वा दशाङ्गुले पीतवर्णं पार्थिवतत्त्वं लक्षयेदथवा
काशमुखं दृष्ट्वाऽवलोकयेत् किरणानाकुलितं पश्यति सर्वं
निर्मलीकरणमथोध्वंदृष्ट्यन्तरालं लक्षयेज्ज्योतिर्मुखानि
पश्यत्यथवा तदभ्यन्तरं तत्राकाशं लक्षयेदाकाशसदृशचित्तं
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६५