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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 62 of 526

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Page 62

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विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
राजा को भी शान्त घोड़े आदि से भी बाजार के अन्दर न जाने का निर्देश१७६बिना जज की आज्ञा के वादी-प्रतिवादी के विषय में सत्यासत्यादि बातें न कहने का निर्देश१७९
पथिकों को यात्रा के समय कर्त्तव्या-कर्त्तव्य विषयों का निर्देश”अन्य के विवाद को ग्रहण कर किसी के संग विवाद न करने का निर्देश”
शीघ्र वृद्धता लानेवाले विषयों का निर्देश”बिना शास्त्रज्ञान के न करने योग्य विषयों का निर्देश१८०
प्रिय होने के उपाय”पारतन्त्र्य से बढ़कर दुःख और स्वतन्त्रता से बढ़कर सुख न होने का निर्देश”
अप्रिय होने के कारणों का निर्देश”प्रत्यक्षादि ४ प्रमाणों से व्यवहार ज्ञान होने का निर्देश”
स्तुति से देवता के वशवर्ती होने का निर्देश”मित्र और शत्रु के प्रकारों का निर्देश१८१
स्वदुर्गुणों का स्वयं विचार करने का निर्देश१७७४ पादों से युक्त उत्तम मित्र के लक्षण”
महान् पुरुष के लक्षण”बैरभाव रखनेवालों के दो लक्षणों का निर्देश१८२
साधु पुरुष तथा खल पुरुष के लक्षण”परम शत्रु और एकतरफा शत्रु भाइयों के लक्षण”
कलहकारक क्रीडा आदि करने का निषेध१७८राजाओं की परस्पर कृत्रिम-मित्रता का निर्देश”
मित्र के प्रति कर्त्तव्याकर्त्तव्य विषयों का निर्देश”सहज मित्र कहलानेवालों का निर्देश१८३
बलवान के प्रति विपरीत बातें न करने का निर्देश”विद्यादि ५ की सहज मित्रता का निर्देश”
मनुष्य को आपत्ति पड़ने पर कर्त्तव्य कर्मों का निर्देश”सार्थक पुत्र के लक्षण”
वृद्धजनों के अनुकूल वचन-बोलने का एवं किसी की स्त्री को घूर कर न देखने का निर्देश१७९स्वाभाविक शत्रु के लक्षण”
अन्य के अपराधी बालक को दण्ड न देने का निषेध”परस्पर शत्रु कहलानेवालों का निर्देश”
ग्राम को छोड़कर अन्यत्र वास करने की अवस्थाओं का निर्देश”मूर्ख पुत्रादिकों की शत्रु संज्ञा का निर्देश”