शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context४०६ | शुक्रनीतिः
श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन—श्रीकृष्ण भगवान के समान कोई दूसरा राजा कूटनीति का प्रयोग करनेवाला नहीं हुआ, जिन्होंने कूटनीति द्वारा जबर-दस्ती अपनी बहन सुभद्रा अर्जुन को दिला दी (ब्याह दी)
नीतिमत्तान्तु सा युक्तिर्या हि स्वश्रेयसेऽखिला ॥ ६० ॥
नीतिमानों की वही युक्ति वस्तुतः युक्ति (उपाय) है जो उनके संपूर्ण कल्याण करने में उचित हो।
आदौ तद्धितकृत्स्नेहं कार्यं स्नेहमनन्तरम् ।
कृत्वा सधर्मवादं च मध्यस्थः साधयेद्धितम् ॥ ६१ ॥
हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश—मध्यस्थ (उदासीन) पुरुष प्रथम किसी के हितैषी मित्र के साथ स्नेह, तदनन्तर कर्त्तव्य कर्म और धर्मकथनपूर्वक स्नेह-प्रदर्शन करके हित सिद्ध करे।
परस्परं भवेत् प्रीतिस्तथा तद्गुणवर्णनम् ।
इष्टान्नधनवसनैर्लोभनं कार्यसिद्धिदम् ॥ ६२ ॥
परस्पर जैसे प्रीति हो वैसे उसके प्रेम के गुणों का वर्णन करे। और अभीष्ट अन्न-वस्त्र का लोभ दिखाये। यह कार्य-सिद्धि करने वाला होता है।
दिव्यावलम्बनं मिथ्या संल्लापं धैर्य्यवर्धनम् ।
इमे उपाया मध्यस्थ-कुट्टिनीकारिणां मताः ॥ ६३ ॥
मध्यस्थ (उदासीन), कुट्टिनी और धूर्त्त लोगों को दिव्य (शपथ) का अवलम्बन, झूठमूठ (मनगढन्त) बात करना और धैर्य बँधाना ये सब उपाय इष्ट होते हैं। इससे वे लोग कार्य सिद्ध करते हैं।
नात्मसङ्गोपने युक्तिं चिन्तयेत् स पशोर्जडः ।
जारसङ्गोपने छद्म संश्रयन्ति स्त्रियोऽपि च ॥ ६४ ॥
अपनी रक्षा की युक्ति का विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश—जो अपनी रक्षा करने के लिये उपाय नहीं सोचता है वह पशु से भी बढ़कर जड़ है। और स्त्रियां भी अपने जार पति को छिपाने में छल का आश्रय लेती हैं।
युक्तिश्छलात्मिका प्रायस्तथान्या योजनात्मिका ।
यच्छद्माचारी भवति तेन छद्मा समाचरेत् ॥ ६५ ॥
अन्यथा शीलनाशाय महतामपि जायते ।
कार्यसिद्धयर्थ दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश—कार्यसिद्धि के लिये युक्ति (उपाय) दो प्रकार की होती है, उसमें प्रायः करके छलरूपा पहली और सत्यरूपा दूसरी होती है। जो छल करनेवाले हैं, उनके लिये छलरूपा युक्ति का प्रयोग करना चाहिये। अन्यथा छल करना बड़े लोगों के चरित्र को बिगाड़ देनेवाली हो जाती है।