शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context४०० | शुक्रनीतिः
दुष्परिणाम—जो नवीन राजा राजकुल के भक्त मन्त्री आदियों के साथ द्वेष करता है और नवीन लोगों के कथनानुसार कार्य करता है वह शत्रु के अधीन हो जाता है और अपने धन तथा प्राणों को भी खो बैठता है।
गुणी सुनीतिर्नवोऽपि परिपाल्यस्तु पूर्ववत्।
प्राचीनैः सह तं कार्ये ह्यनुभूय नियोजयेत् ॥ २५ ॥
नवीन मन्त्री आदि की नियुक्ति की व्यवस्था—और यदि कोई नवीन होता हुआ भी गुणवान तथा सुन्दर नीतिकुशल अधिकारी हो तो उसका पालन प्राचीनों की तरह करना चाहिये। और भली भांति से अनुभव करने के बाद उसे प्राचीनों के साथ राजकार्य में नियुक्त करना चाहिये।
अतिमृदुस्तुतिनतिसेवादानप्रियोक्तिभिः ।
मायिकैः सेव्यते यावत् कार्यं नित्यं तु साधुभिः ॥ २६ ॥
प्रत्यक्षं वा परोक्षं वा सत्यवाग्भिर्नृपोऽपि च ।
याथार्थ्यतस्तयोरिहगन्तरं खभुवोर्यथा ॥ २७ ॥
धूर्त्त तथा साधु जन के अन्तर ज्ञात करने का निर्देश—जो धूर्त्त होते हैं वे जब तक अपना कार्य सिद्ध करना रहता है तभी तक अत्यन्त मृदु व्यवहार, स्तुति (प्रशंसा), नमन, सेवा, दान तथा प्रियवचन आदि से राजा की सेवा करते हैं और जो सज्जन हैं वे सत्यवचनों से प्रत्यक्ष या परोक्ष में सदा राजा की सेवा करते हैं यथार्थ में उन दोनों (धूर्त्त तथा सज्जन) में इतना अधिक अन्तर है जितना कि आकाश तथा पृथ्वी में है।
मायाया जनका धूर्त्ता जारचोरबहुश्रुताः ।
प्रतिष्ठितो यथा धूर्त्तो न तथा तु बहुश्रुताः ॥ २८ ॥
धूर्त्त, जार (व्यभिचारी) और चोर में धूर्त्त की माया करने में श्रेष्ठता का निर्देश—माया के उत्पन्न करनेवाले धूर्त्त, जार और चोर होते हैं, यह बात अत्यन्त प्रसिद्ध है। किन्तु जिस प्रकार से धूर्त्त इसमें श्रेष्ठ माना जाता है। उस प्रकार से जार और चोर नहीं माने जाते हैं।
परस्वहरणं लोके जारचोरौ तु निन्दितौ ।
तावप्रत्यक्षं हरतः प्रत्यक्षं धूर्त एव हि ॥ २९ ॥
धूर्त्तो की धूर्त्तता का वर्णन—दूसरे की वस्तु या धन हरण करने में प्रवृत्त होने से जार और चोर ये दोनों लोक में निन्दित माने जाते हैं। किन्तु वे दोनों तो सामने नहीं धनादि हरते हैं, पर धूर्त तो सामने ही हर लेता है।
हितं स्वहितवच्चान्ते अहितं हितवत् सदा ।
धूर्त्ताः सन्दर्शयित्वाऽज्ञं स्वकार्यं साधयन्ति ते ॥ ३० ॥
वे धूर्त्त लोग मूर्ख लोगों के समक्ष हितकर को अहितकर की भांति पूर्व