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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 484 of 526

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Page 484
३९८शुक्रनीतिः

पति आदि भी, कोई तत्काल ही और कोई कुछ समय के बाद, शक्तिहीन हो जाते हैं।

राज्यवृक्षस्य नृपतिर्मूलं स्कन्धाश्च मन्त्रिणः ॥ १२ ॥
शाखाः सेनाधिपाः सेनाः पल्लवाः कुसुमानि च ।
प्रजाः फलानि भूभागा बीजं भूमिः प्रकल्पिता ॥ १३ ॥

राज्य को वृक्ष की समता का निर्देश— राज्यरूपी वृक्ष का मूल (जड़) राजा होता है, स्कन्ध (मोटी डालें)—मन्त्री लोग, शाखायें—सेनापति लोग, पल्लव—सेनायें, फूल—प्रजायें, फल—भूमि से प्राप्त होनेवाले कर (मालगुजारी) एवं बीज—राज्य की भूमि ये सब मानी गई हैं।

विश्वस्तान्न्यनृपस्यापि न विश्वासं समाप्नुयात् ।
नैकान्ते न गृहे तस्य गच्छेदल्पसहायवान् ॥ १४ ॥

राजा को अवश्य पालन करने योग्य नियमों का निर्देश— विश्वास के योग्य अपने को व्यवहार द्वारा सिद्ध करनेवाले भी शत्रु राजा का विश्वास नहीं करना चाहिये। अतः उसके साथ एकान्त में अथवा उसके गृह पर थोड़े सहायकों के साथ न जावे।

स्ववेषरूपसदृशान् निकटे रक्षयेत् सदा ।
विशिष्टचिह्नगुप्तः स्यात् समयेऽन्यादृशो भवेत् ॥ १५ ॥

अपने निकट सदा अपने समान वेष तथा स्वरूपवाले अन्य लोगों को रक्खे, जिससे कोई न पहचान सके कि कौन इनमें से राजा है? और स्वयं अपना राजचिह्न गुप्त रखे और समय पर दूसरे के समान बन जाय।

वेश्याभिश्च नटैर्मद्यैर्गायकैर्मोहयेदरिम् ।

और वेश्याओं, नटों, मद्य तथा गायकों द्वारा शत्रु को मुग्ध बना दें (कर्त्तव्याकर्त्तव्य ज्ञानशून्य कर दें)।

सुवस्त्राभरणैर्नैव न कुटुम्बेन संयुतः ॥ १६ ॥
विशिष्टचिह्नितो भीतो युद्धे गच्छेन्न वै क्वचित् ।

किसी भी युद्ध में सुन्दर-वस्त्र तथा आभूषणों से या कुटुम्ब से युक्त होकर या विशिष्ट राजचिह्न धारण किये हुये या डरा हुआ न जाय।

क्षणं नासावधानः स्याद् भृत्यस्त्रीपुत्रशत्रुषु ॥ १७ ॥
जीवन् सन् स्वामिता पुत्रे न देयाप्यखिलं क्वचित् ।

भृत्य, स्त्री तथा पुत्र के विषय में क्षणभर के लिये भी असावधान न रहें। किसी दशा में भी जीवित रहते हुये पुत्र को अपनी सारी प्रमुखशक्ति (अख्तियार) न प्रदान कर दे।

स्वभावसद्गुणे यस्मान्महानर्थमदावहा ॥ १८ ॥