शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context३६४ | शुक्रनीतिः
द्वैधीभावः स्वसैन्यानां स्थापनं गुल्मगुल्मयोः।
**आश्रय व द्वैधीभाव के लक्षण—**जिसके द्वारा रक्षित होकर दुर्बल भी सबल हो जाय, ऐसे प्रवल किसी राजा का आश्रय लेने को 'आश्रय' कहते हैं। गुल्म-गुल्म (टुकडी २) रूप में विभाजित करके अपनी सेना को रखने को 'द्वैधीभाव' कहते हैं।
बलीयसाभियुक्तस्तु नृपोऽनन्यप्रतिक्रियः ॥ २३७॥
आपन्नः सन्धिमन्विच्छेत् कुर्वाणः कालयापनम्।
**सन्धि करने योग्य पुरुषों का निर्देश—**अत्यन्त बलवान द्वारा आक्रमण किये जाने पर कोई प्रतीकार का उपाय न होने से आपत्ति में पड़ा हुआ राजा अच्छे समय की प्रतीक्षा करता हुआ उससे सन्धि कर ले।
एक एवोपहारस्तु सन्धिरेष मतो हितः ॥ २३८॥
उपहारस्य भेदास्तु सर्वे ये मैत्रवर्जिताः।
**उपहार रूप सन्धि की सर्वश्रेष्ठता का निर्देश—**उस समय केवल उपहार (भेंट) देकर 'सन्धि' करना ही हितकर होता है। मित्रता को छोड़कर जितने भी सन्धि के प्रकार हैं वे सभी इस उपहार के ही भेद माने जाते हैं। अर्थात् इससे बढ़कर सन्धि के दूसरे प्रकार श्रेष्ठ नहीं हैं।
अभियोक्ता बलीयस्त्वादलब्ध्वा न निवर्तते ॥ २३९॥
उपहारादृते यस्मात् सन्धिरन्यो न विद्यते।
आक्रमणकारी अत्यन्त बलवान होने से बिना भेंट पाये युद्ध से निवृत्त नहीं होता है। अतः उपहार को छोड़कर अन्य कोई दूसरा सन्धि का उपाय नहीं है।
शत्रोर्बलानुसारेण उपहारं प्रकल्पयेत् ॥ २४०॥
सेवां बाऽपि च स्वीकुर्याद्दद्यात् कन्यां भुवं धनम्।
**शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना के भेद—**शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना की जाती है। जिसमें उसकी सेवा स्वीकार करनी पड़ती है किंवा अपनी कन्या, पृथ्वी (राज्य का कुछ अंश) या धन उपहार में देना पड़ता है।
स्वसामन्तांश्च सन्धियान् मन्त्रेणान्यजयाय वै ॥ २४१॥
सन्धिः कार्योऽप्यनार्येण सम्प्राप्योत्सादयेद्धि सः।
**पार्श्ववर्ती अनार्य राजा से भी सन्धि करने का निर्देश—**शत्रु को जीतने के लिये मन्त्रणा के द्वारा अपने पास के सामन्तों के साथ सन्धि कर ले। और सन्धि तो अनार्य (म्लेच्छ आदि) के साथ भी कर लेनी चाहिये, क्योंकि सन्धि न करने पर समय पाकर नुकसान पहुँचा सकता है।