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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 447 of 526

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Page 447

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६१

अन्यथा दुःखमाप्नोति स्वराज्याद् भ्रश्यतेऽपि च ।

युद्ध की इच्छा करने योग्य राजा का लक्षण— जो राजा युद्ध के लिये उपयुक्त सामग्रियों से परिपूर्ण और समयानुसार सन्धि, विग्रह (युद्ध), यान (चढ़ाई करना), आसन (अपने स्थान पर रहकर युद्ध के लिये तयार रहना), द्वैध (शत्रु के गोल में फूट डाल देना) इन षः गुणों एवं मन्त्रणा करना इनका जानकार, एवं बहुत से अस्त्र-शस्त्रादिकों से युक्त हो वही युद्ध करने की इच्छा रखे अन्यथा युद्ध करने पर वह दुःख पाता है और अपने राज्य को भी खो बैठता है।

आबिभ्रतोः शत्रुभावमुभयोः संयतात्मनोः ॥ २१६ ॥
अस्त्राद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थं व्यापारो युद्धमुच्यते ।

युद्ध का सामान्य लक्षण— परस्पर शत्रुभाव रखते हुये निश्चल चित्त होकर दो व्यक्तियों का अस्त्रादिकों के द्वारा जो व्यापार होता है, उसे 'युद्ध' कहते हैं।

मन्त्रास्त्रैर्देविकं युद्धं नालाद्यस्त्रैस्तथाऽऽसुरम् ॥ २२० ॥
शस्त्रबाहुसमुत्थं तु मानवं युद्धमीरितम् ।

युद्ध के भेद और लक्षण— मन्त्र के द्वारा अस्त्रों का प्रयोग जिसमें हो उसे 'दैविक' युद्ध तथा तोप-बन्दूक आदि अस्त्रों के द्वारा प्रवृत्त युद्ध को 'आसुर' एवं शस्त्र (खड्गादि) तथा बाहु द्वारा प्रवृत्त युद्ध को 'मानव' कहते हैं।

एकस्य बहुभिः सार्धं बहूनां बहुभिश्च वा ॥ २२१ ॥
एकस्यैकेन वा द्वाभ्यां द्वयोर्वा तद्भवेत् खलु ।

और वह युद्ध एक का बहुतों के साथ, बहुतों का बहुतों के साथ, एक का एक के साथ अथवा दो का दो के साथ होता है।

कालं देशं शत्रुबलं दृष्ट्वा स्वीयबलं ततः ॥ २२२ ॥
उपायान् षड्गुणं मन्त्रं भवेच्च युद्धकामुकः ।

काल, देश, शत्रु का तथा अपना बल, उपाय (साम, दान, भेद, दण्ड), षड्गुण (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध, आश्रय) और मन्त्र इन सबों का विचार करके ही युद्ध में प्रवृत्त होना चाहिये।

शरद्धेमन्तशिशिरकालो युद्धेषु चोत्तमः ॥ २२३ ॥
बसन्तो मध्यमो ज्ञेयोऽधमो ग्रीष्मः स्मृतः सदा ।

युद्ध के लिये काल-विचार— युद्ध के लिये शरद्, हेमन्त तथा शिशिर ऋतु का समय उत्तम होता है। बसन्त का मध्यम और ग्रीष्म का सदा अधम समय होता है।

वर्षासु न प्रशंसन्ति युद्धं साम स्मृतं तदा ॥ २२४ ॥