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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 444 of 526

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Page 444

३५८ | शुक्रनीतिः

मूलकीलभ्रमाल्लक्ष्यसमसंधानभाजि यत् ।
बृहन्नालिकसंज्ञं तत् काष्ठबुध्नविनिर्मितम् ॥ १९६॥
प्रवाह्यं शकटाद्यैस्तु सुयुक्तं विजयप्रदम् ।

**बृहन्नालिक (तोप) के लक्षण—**जैसे २ नाल की चद्दर मोटी हो और जैसे २ छिद्र की चौड़ाई अधिक हो, जैसे २ नाल की लम्बाई अधिक हो एवं जैसे २ गोले का आकार बड़ा हो, वैसे २ बृहद् नालिक (तोप) दूर तक लक्ष्य भेदन करनेवाली होती है। और जिसके मूल भाग में लगी हुई कील को घुमाने से वह लक्ष्य के अनुरूप गोले को फेंकनेवाली होती है। उसका मूल भाग काठ का बना हुआ होता है। और बैलगाड़ी आदि से ही उसे ढोया जा सकता है। यदि इसका उचित रीति से प्रयोग किया जाय तो विजय देनेवाला होता है।

सुवर्चिलवणात्पञ्चपलानि गन्धकात् पलम् ॥ २००॥
अन्तर्धूमविपकार्कस्नुह्याद्यङ्गारतः पलम् ।
शुद्धात् संग्राहा संचूर्ण्य संमील्य प्रपुटेद्रसैः ॥ २०१॥
स्नुह्यर्काणां रसोनस्य शोषयेदातपेन च ।
पिष्ट्वा शर्करवच्चैतदग्निचूर्णं भवेत् खलु ॥ २०२॥

**अग्निचूर्ण (बारूद) बनाने का प्रकार—**सोरा ५ पल (२० तो०), गन्धक १ पल (४ तो०), आक तथा सेहुंड आदि के अन्तर्धूम द्वारा बने हुये विशुद्ध कोयले १ पल लेकर सबों का चूर्ण एकत्र कर पुनः आक, सेहुंड तथा लहसुन के रस का पुट देकर धूप में सुखाकर चूर्ण करके रख ले। यही शर्करा (बालू) की भांति तैयार हुई वस्तु 'अग्निचूर्ण' (बारूद) कहलाती है।

सुवर्चिलवणाद्भागाः षड् वा चत्वार एव वा ।
नालास्त्रार्थाग्निचूर्णे तु गन्धाङ्गारौ तु पूर्ववत् ॥ २०३॥

अथवा नालास्त्र (बन्दूक आदि) के लिये जो बारूद बनाई जाती है उसमें सोरा ६ या ४ पल दे सकते हैं शेष गन्धक और अङ्गार (कोयला) पूर्ववत् डाल सकते हैं।

गोलो लोहमयो गर्भगुटिकः केवलोऽपि वा ।
सीसस्य लघुनालायें ह्यन्यधातुभवोऽपि वा ॥ २०४ ॥

**गोला बनाने का प्रकार—**तोप का गोला लोहे का या उसके अन्दर छोटी २ गोलियाँ भरी रहती हैं, दोनों प्रकार का होता है। और बन्दूक के लिये सीसे की या अन्य धातु की बनी हुई बड़ी गोलियां या छर्रे होते हैं।

लोहसारमयं वापि नालास्त्रं त्वन्यधातुजम् ।
नित्यसम्मार्जनस्वच्छमस्त्रपातिमिराधृतम् ॥ २०५॥