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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 408 of 526

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Page 408

३२२ शुक्रनीतिः

शिल्पियों की भृति का विचार—कारीगरों के कार्य तथा गुण को देखकर उनकी मजदूरी या तनखाह देवे।

पञ्चमांशं चतुर्थांशं तृतीयांशं तु कल्पयेत्।
अर्धं वा राजताद्राज्ञा नाधिकं तु दिने दिने॥ ३२२॥

स्वर्णकार की भृति का विचार—राजा प्रतिदिन चांदी की विक्री में से पांचवां, चौथा, तीसरा या आधा भाग योग्यतानुसार कर रूप में ग्रहण करे। किन्तु आधे से अधिक कर न लेवे।

विद्रुतं न तु हीनं स्यात् स्वर्णं पलशतं शुचि।
चतुःशतांशं रजतं ताम्रं न्यूनं शतांशकम्॥ ३२३॥

१०० पल (४०० भर) भर निर्दोष सोना गलाने पर तौल में कम नहीं होना चाहिये। निर्दोष चांदी (१०० पल भर) गलाने पर ४०० वां अंश तथा तामा १०० वां अंश न्यून होना चाहिये।

वङ्गं च जसद्ं सीसं हीनं स्यात् षोडशांशकम्।
अयोऽष्टांशं त्वन्यथा तु दण्ड्यः शिल्पी सदा नृपैः॥ ३२४॥

रांगा, जस्ता और सीसा (धातु विशेष) गलाने पर १६ वां भाग कम होना चाहिये। लोहा तो गलाने पर अष्टमांश हीन होना चाहिये। अन्यथा (पूर्वोक्त मान से अधिक हीन होने पर) गलानेवाला कारीगर राजा द्वारा सदा दण्डनीय होता है।

सुवर्णं द्विशतांशं तु रजतं च शतांशकम्।
हीनं सुघटिते कार्ये सुसंयोगे तु वर्धते॥ ३२५॥
षोडशांशं त्वन्यथा हि दण्ड्यः स्यात् स्वर्णकारकः।
संयोगघटनं दृष्ट्वा वृद्धिं ह्रासं प्रकल्पयेत्॥ ३२६॥

सुन्दर रीति से अलंकार आदि बनाये जाने में छीलने आदि से सोना २०० वां अंश और चांदी १०० वां अंश तौल में हीन हो जाता है। सुन्दर रीति से टांका आदि देने में १६ वां अंश तौल में बढ़ जाता है। इससे अन्यथा तौल में न्यूनाधिक्य होने पर सुनार दण्डनीय होता है। और जिस प्रकार टांका आदि देने में मिलावट की जाती है उसी के अनुसार विचारक द्वारा सोने आदि की वृद्धि तथा ह्रास की कल्पना की जानी चाहिये।

स्वर्णस्योत्तमकार्ये तु भृतिस्त्रिंशांशकी मता।
षष्ठ्यंशकी मध्यकार्ये हीनकार्ये तदर्धकी॥ ३२७॥

सोने के उत्तम बने हुये अलङ्कार की बनवाई मजदूरी ३० वां भाग के तुल्य होती है। मध्यम बने हुये की ६० वां भाग तथा हीन बने हुये की १२० वां भाग के तुल्य मजदूरी होती है।