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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 405 of 526

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Page 405

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१९

नर्तकादियों का धनविभागविषयक निर्देश— नाचनेवालों के लिये भी वही विधि विद्वानों ने कही है। जैसे ताल का जाननेवाला अर्जित धन का आधा भाग पाता है शेष धन में गाने वाले सब लोग समान-समान भाग में बाँट लेते हैं।

परराष्ट्राद्धनं यत्स्याच्चोरैः स्वाम्याज्ञया हृतम् ॥ ३०५ ॥
राज्ञे षष्ठांशमुद्धृत्य विभजेरन् समांशकम् ।

चोरों का धनविभागविषयक निर्देश— अपने स्वामी की आज्ञा से चोर लोग दूसरे के राज्य में जाकर जो धन चुराकर लाते हैं उसमें से छठा भाग राजा को देने के बाद शेष धन को आपस में समान भाग से बाँट कर ले लेते हैं।

तेषां चेत् प्रस्रुतानां च ग्रहणं समवाप्नुयात् ॥ ३०६ ॥
तन्मोक्षार्थं च यद्दत्तं वहेयुस्ते समांशतः ।

और यदि चोरी करने के बाद वे लोग पकड़ लिये जावें तो अपने छूटने के लिये जो द्रव्य खर्च हो उसको समान भाग से बाँट कर अपने-अपने हिस्से में से दे देवें।

प्रयोगं कुर्वते ये तु हेमधान्यरसादिना ॥ ३०७ ॥
समन्यूनाधिकैरंशैर्लाभास्तेषां तथाविधः ।
समो न्यूनोऽधिको ह्यांशो योऽनुक्षिप्तस्तथैव सः ॥ ३०८ ॥

व्यापारी आदियों का धनविभागविषयक निर्देश— जो लोग मिलकर सुवर्ण, धान्य तथा रसादि द्रव्य का कोई व्यवसाय करते हैं उन में जिसका जैसा कार्य हो और धन लगा हो उसके अनुरूप बराबर, न्यून या अधिक अंश में लाभांश में से उन्हें मिलता है। अर्थात् व्यवसाय के प्रारम्भ में उन लोगों ने सम, न्यून या अधिक अंश में जो द्रव्य लगाया हो उसी के अनुसार उनका भाग होता है।

व्ययं दद्यात् कर्म कुर्याल्लाभं गृह्णीत चैव हि ।
वणिजानां कर्षकाणामेष एव विधिः स्मृतः ॥ ३०९ ॥

एवं वे तदनुसार व्यय एवं कर्म करते हैं तथा लाभ भी प्राप्त करते हैं। यह विधि बनियों और कृषकों के लिये कही हुई है।

सामान्यं याचितं न्यास आधिर्दासाश्च तद्धनम् ।
अन्वाहितं च निक्षेपः सर्वस्वं चान्वये सति ॥ ३१० ॥
आपत्स्वपि न देयानि नव वस्तूनि पण्डितैः ।

आपत्काल होने पर भी नवविध धनों को न देने का निर्देश— १. बटवारे में प्राप्त धन, २. पुनः लौटा देने के लिये मांगकर लाया हुआ धन, ३. धरोहर