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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 402 of 526

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Page 402

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शुक्रनीतिः

होती हैं। किन्तु केवल एक राजा स्वतन्त्र होता है। और शिष्य परतन्त्र माना जाता है। और आचार्य में स्वतन्त्रता मानी जाती है।

सुतस्य सुतदाराणां वशित्वमनुशासने।
विक्रये चैव दाने च वशित्वं न सुते पितुः॥ २८७॥

पुत्र और पुत्रवधुओं को पिता या श्वशुर की आज्ञा मानने में पराधीनता मानी गई है किन्तु समर्थ पुत्र के लिये बेचने और दान देने में पिता की आज्ञा की प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं मानी गई है।

स्वतन्त्राः सर्व एवैते परतन्त्रेषु नित्यशः।
अनुशिष्टौ विसर्गे वाऽविसर्गे चेश्वरा मताः॥ २८८॥

परतन्त्र होने पर भी ये सभी पुत्र सदा स्वतन्त्र ही माने जाते हैं क्योंकि पिता के साथ मन्त्रणा करने, देने और न देने में स्वाधीन माने गये हैं।

मणिमुक्ताप्रवालानां सर्वस्यैव पिता प्रभुः।
स्थावरस्य तु सर्वस्य न पिता न पितामहः॥ २८९॥

**स्वामित्व का निर्णय—**मणि, मुक्ता (मोती) और प्रवाल (मूंगा) आदि संपूर्ण चल संपत्ति के ऊपर पिता का प्रभुत्व रहता है। किन्तु संपूर्ण स्थावर (अचल) संपत्ति के ऊपर पिता या पितामह का पूर्ण प्रभुत्व नहीं रहता है, हाँ आंशिक रूप से रहता है।

भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः।
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद्धनम् ॥ २९०॥

पत्नी, पुत्र और नौकर ये तीनों ही क्रम से पति, पिता और स्वामी के रहते दम तक अधन (धन के स्वामित्व से हीन) माने गये हैं अतः इन ये लोग जो कुछ भी धन कहीं से प्राप्त करते हैं ये सब जिनके पत्नी, पुत्र या नौकर होते हैं उन्हीं के अधिकार में चले जाते हैं, इसी से ये 'अधन' कहलाते हैं अर्थात् इनका अपना कोई अलग धन नहीं होता है।

वर्तते यस्य यद्धस्ते तस्य स्वामी स एव न।
अन्यस्वमन्यहस्तेषु चौर्याद्यैः किन्न दृश्यते ॥ २९१॥

जो धन जिनके हाथ में रहता है उस धन का स्वामी वही नहीं माना जाता है जैसे चोरी आदि कारणों से दूसरे का धन दूसरे के हाथ में क्या नहीं देखा जाता है किन्तु हाथ में रखा देखने मात्र से वह उस धन का स्वामी नहीं माना जाता है।

तस्माच्छास्त्रात एव स्यात् स्वाम्यं नानुभवादपि।
अस्यापहृतमेतेन न युक्तं वक्तुमन्यथा॥ २९२॥

इससे शास्त्रानुसार ही किसी धन का कोई स्वामी हो सकता है केवल