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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 400 of 526

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Page 400

३१४ | शुक्रनीतिः

वाला यह समझे कि हमारे फैसले में निर्णय या आज्ञा जो हुई है वह अधर्मयुक्त हुई है अर्थात् नियम-विरुद्ध हुई है तो दूना दण्ड देकर पुनः उस मुकद्दमे पर विचार करवा सकता है ।

साक्षिसभ्यावसन्नानां दूषणं दर्शनं पुनः ।
स्वचर्यावसितानां च प्रोक्तः पौनर्भवो विधिः ॥ २७६ ॥

पौनर्भव विधि के लक्षण— साक्षी तथा सभासदों के द्वारा जिसकी हार हुई और उन लोगों के द्वारा फैसले का बहिष्कार करने पर पुनः मुकद्दमे पर विचार किया जाता है या स्वयं ही विचार करने में यदि राजा या सभासद आदि की त्रुटि हो गई हो तो भी पुनः विचार करना उचित होता है ।

अमात्यः प्राड्विवाको वा ये कुर्युः कार्यमन्यथा ।
तत् सर्वं नृपतिः कुर्यात्तान् सहस्रं तु दण्डयेत् ॥ २७७ ॥

मन्त्री आदि को नियमविरुद्ध फैसला करने पर अर्थदण्ड देने का निर्देश— यदि मन्त्री या प्राड्विवाक ( जज ) कोई भी नियम-विरुद्ध फैसला करे तो राजा स्वयं पुनः विचार कर दूसरा उचित फैसला करे और उन सबों के ऊपर १००० का अर्थदण्ड ( जुर्माना ) करे ।

नहि जातु विना दण्डं कश्चिन्मार्गेऽवतिष्ठते ।
सन्दर्शिते सभ्यदोषे यदुद्धृत्य नृपो नयेत् ॥ २७८ ॥

क्योंकि बिना दण्ड के कोई कभी उचित मार्ग पर नहीं चल सकता। अस्तु, विवाद करनेवाले के द्वारा न्यायसभा के सदस्यों का दोष दिखाये जाने पर उस दोष का निवारण करके राजा उचित फैसला करे ।

प्रतिज्ञाभावनाद्वादी प्राड्विवेकादिपूजनात् ।
जयपत्रस्य चादानाज्जयी लोके निगद्यते ॥ २७९ ॥

जयी के लक्षणों का निर्देश— वादी जिस विषय में दावा करता है उसको प्रमाणित करने से एवं प्राड्विवाक ( जज ) आदि के द्वारा सत्य विवाद उपस्थित करने की प्रशंसा किये जाने पर तथा विजयपत्र ( डिक्री ) प्राप्त करने से लोक में वादी विजयी माना जाता है ।

सभ्यादिभिर्विनिर्णीतं विधृतं प्रतिवादिना ।
दृष्ट्वा राजा तु जयिने प्रदद्याज्जयपत्रकम् ॥ २८० ॥

जयी को जयपत्र देने के प्रकार का निर्देश— सभ्यादियों के द्वारा विवाद की सत्यता निर्णीत हुई एवं प्रतिवादी द्वारा भी स्वीकृत जान कर राजा वादी को जयपत्र ( डिक्री ) दे ।

अन्यथा ह्यभियोक्तारं निरुन्ध्याद् बहुवत्सरम् ।