Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 393 of 526

Read in context
Page 393

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०७

वह विशुद्ध होकर लोक में कीर्ति तथा परलोक में स्वर्ग निश्चय प्राप्त करता है। अन्यथा नहीं प्राप्त करता है।

अग्निर्विषं घटस्तोयं धर्माधर्मौ च तण्डुलाः ॥ २३५ ॥
शपथाश्चैव निर्दिष्टा मुनिभिर्दिव्यनिर्णये।

दिव्य-निर्णय में पदार्थों का निर्देश— दिव्य परीक्षा द्वारा निर्णय करने में अग्नि, विष, तुला, जल, धर्म-अधर्म, चावल और शपथ इन सबों का निर्देश किया है।

पूर्वं पूर्वं गुरुतरं कार्यं दृष्ट्वा ऽनियोजयेत् ॥ २३६ ॥
लोकप्रत्ययतः प्रोक्तं सर्वं दिव्यं गुरु स्मृतम् ।

इनमें उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व के दिव्य चावल आदि अधिक महत्त्व-शाली हैं। इनका प्रयोग यथायोग्य कार्य की गुरुता देखकर ही किया जाता है। साधारणतया लोगों का विश्वास होने से सभी दिव्य शपथ गौरवपूर्ण माने जाते हैं।

तप्तायोगोलकं धृत्वा गच्छेन्नव पदं करे ॥ २३७ ॥
तप्ताङ्गारेषु वा गच्छेत् पद्भ्यां सप्त पदानि हि ।
तप्ततैलगतं लोहमाषं हस्तेन निर्हरेत् ॥ २३८ ॥
सुतप्तलोहपत्रं वा जिह्वया संलिहेदपि ।

अग्नि दिव्य के प्रकार का निर्देश— तपाने से लाल हुये लोहे के गोले को हाथ में लेकर कुछ दूर चले यदि हाथ में जलने का न चिह्न हो या जलते हुये अंगारों पर ७ पग नंगे पैरों से चले किन्तु पैर न जले किंवा खौलते हुये तेल में से लोहे के उरदों को हाथ से निकाले किन्तु हाथ न जले अथवा अत्यन्त तपाने से लाल हुये लोह के पत्थरों को जीभ से चाटे पर जीभ न जले।

गरं प्रभक्षयेद्धस्तैः कृष्णसर्पं समुद्धरेत् ॥ २३९ ॥
कृत्वा स्वस्य तुलासाम्यं हीनाधिक्यं विशोधयेत् ।

गर तथा घट दिव्य के प्रकार का निर्देश— विष का भक्षण करे या हाथ से काले सर्प को बांबी आदि में से निकालते समय डँसे जाने पर विष का असर न हो तो निर्दोष जानना चाहिये। और तुला (तराजू) पर एक तरफ बैठ कर दूसरी तरफ बांट रखकर तौलने पर हीन या अधिक होने के द्वारा विशुद्धि की परीक्षा करे।

स्वेष्टदेवस्नपनजमद्यादुदकमुत्तमम् ॥ २४० ॥
यावन्नियमितः कालस्तावदप्सु निमज्जयेत् ।

जल दिव्य के प्रकार का निर्देश— अपने इष्टदेव को स्नान कराये गये