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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 386 of 526

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Page 386
३००शुक्रनीतिः

अर्थिप्रत्यर्थिसांनिध्ये साध्यार्थेऽपि च सन्निधौ ।

**साक्षी लेने में राजा को कालक्षेप न करने का निर्देश—**साक्षी की साक्षी लेने में राजा समय न बितावे जब कि वादी-प्रतिवादी समीप में उपस्थित हों, और उन दोनों के समक्ष व्यवहार देखने में भी देरी न करे।

प्रत्यक्षं वाद्येत् साक्ष्यं न परोक्षं कथंचन ॥ १६३ ॥
नाङ्गीकरोति यः साक्ष्यं दण्ड्यः स्याद् देशितो यदि ।

**प्रत्यक्ष साक्षी की साक्षी लेने का निर्देश—**और वादी-प्रतिवादी के समक्ष में ही साक्षी की साक्षी सदा लेनी चाहिये, परोक्ष में कभी भी नहीं। और यदि आज्ञा देने पर भी साक्षी देने को साक्षी न तैयार होता है तो वह दण्डनीय होता है।

यः साक्षान्नैव निर्दिष्टो नाहूतो नैव देशितः ॥ १६४ ॥
ब्रूयान्मिथ्येति तथ्यं वा दण्ड्यः सोऽपि नराधमः ।

**दण्ड्य और नीच साक्षी के लक्षण—**जो विचारपति के समक्ष साक्षी देने के लिये उपस्थित न किया गया हो या बुलाया न गया हो अथवा आदेश न प्राप्त किया हो वह नराधम चाहे झूठ या सच ही कहे फिर भी दण्डनीय ही होता है।

द्वैधे बहूनां वचनं समेषु गुणिनां वचः ॥ १६५ ॥
तत्राधिकगुणानां च गृह्णीयाद्वचनं सदा ।

जहां पर बहुत से साक्षियों के वचनों में विभिन्नता होने से सत्यासत्य निर्णय में संशय हो जाय वहाँ पर अधिक संख्यावालों की बात माने। यदि समान संख्यावालों में विभिन्नता हो तो उनमें से जिधर गुणी पुरुष हों उनके वचन माने एवं यदि गुणियों के वचनों में विभिन्नता जिस विषय में हो तो जो अधिक गुणी हों उनकी ही बात माने।

यत्रानियुक्तोऽपीक्षेत शृणुयाद्वापि किञ्चन ॥ १६६ ॥
पृष्टस्तत्रापि स ब्रूयाद् यथादृष्टं यथाश्रुतम् ।

कोई व्यक्ति बिना नियुक्त किये हुये भी यदि कुछ देखें या सुनें तो उस विषय में पूछे जाने पर वह जैसा देखा या सुना हो कहें।

विभिन्नकाले यज्ज्ञातं साक्षिभिश्वांशतः पृथक् ॥ १६७ ॥
एकैकं वाद्येत्तत्र विधिरेष सनातनः ।

**एक २ से साक्षी को कथन करने का निर्देश—**जहां पर विभिन्न २ समयों में विभिन्न २ साक्षियों ने विवाद के विभिन्न २ विषयों की जो कुछ जानकारी प्राप्त की हो, तो उसे जानने के लिये वहां पर प्रत्येक साक्षियों की साक्षी लेना चाहिये। यह सनातन कर्त्तव्य है।