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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 376 of 526

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Page 376

२६० | शुक्रनीतिः

प्रमाण या लोक-शास्त्र से विरुद्ध, लिखने में न्यूनता, अधिकता या भ्रष्टता से युक्त हो, उसे भाषादोष कहते हैं, अर्थात् ये अर्जीदावा के दोष कहे गये हैं।

अप्रसिद्धं निराबाधं निरर्थं निष्प्रयोजनम् ।
असाध्यं वा विरुद्धं वा पक्षाभासं विवर्जयेत् ॥ १३० ॥

पक्षाभास को छोड़ देने का निर्देश— जो अप्रसिद्ध, निराबाध, निरर्थक, निष्प्रयोजन, असाध्य वा विरुद्ध पक्ष हो उसे 'पक्षाभास' समझ कर छोड़ दे।

न केन चिच्छ्रुतादृष्टः सोऽप्रसिद्ध उदाहृतः ।
अहं मूकेन संशप्तो वन्ध्यापुत्रेण ताडितः ॥ १३१ ॥

अप्रसिद्ध के लक्षण— जो किसी ने न सुना हो और न देखा हो उसे 'अप्रसिद्ध' कहते हैं, जैसे मुझे गूंगे ने गाली दी या बन्ध्या स्त्री के लड़के ने मारा है।

अधीते सुस्वरं गाति स्वगेहे विहरत्ययम् ।
धत्ते मार्गमुखद्वारं मम गेहसमीपतः ॥ १३२ ॥
इति ज्ञेयं निराबाधं निष्प्रयोजनमेव तत् ।

निराबाध या निष्प्रयोजन के लक्षण— यह अपने गृह में रहकर उच्च स्वर से पढ़ता है, या स्वर के साथ सुन्दर रीति से गाता है किंवा विहार करता है। अथवा मेरे घर के समीप में मार्ग की ओर अपने गृह का द्वार बनाता है इन सबों को 'निराबाध' और 'निष्प्रयोजन' भी कहते हैं। क्योंकि ऐसा करने में कोई किसी को रोक नहीं सकता है इससे यह 'निराबाध' और 'निष्प्रयोजन' भी कहलाता है।

सदा मदत्तकन्यायां जामाता विहरत्ययम् ॥ १३३ ॥
गर्भं धत्ते न वन्ध्येयं मृतोऽयं न प्रभाषते ।
किमर्थमिति तज्ज्ञेयमसाध्यं च विरुद्धकम् ॥ १३४ ॥

असाध्य या विरुद्ध के लक्षण— यह मेरा जामाता (दामाद) मेरी दी हुई कन्या के साथ सदा क्यों रमण करता है? यह बन्ध्या स्त्री क्यों नहीं गर्भ धारण करती है। यह मरा हुआ मनुष्य क्यों नहीं बोलता है इन सबों को 'असाध्य' वा 'विरुद्ध' कहते हैं।

मद्दत्तदुःखसुखतो लोको दूयते न न नन्दति ।
निरर्थमिति वा ज्ञेयं निष्प्रयोजनमेव वा ॥ १३५ ॥

निरर्थक या निष्प्रयोजन के लक्षण— मेरे द्वारा दिये दुःख वा सुख से लोग क्यों दुःखी या सुखी होते हैं अथवा निन्दा या स्तुति करते हैं? इसको 'निरर्थक' या 'निष्प्रयोजन' भी कहते हैं।

श्रावयित्वा तु यत्कार्यं त्यजेदन्यद् वदेदसौ ।