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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 37 of 526

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Page 37

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वस्तुस्थिति तो यह है कि 'खिल' को छोड़ कर भी प्रस्तुत शुक्र-नीति-सार में २३६९ श्लोक हैं और 'खिल' के साथ २४५४ श्लोक। कुछ सम्वादात्मक श्लोकों के पृथक्करण से २२०० श्लोक ही मौलिक हैं—ऐसा कहा जा सकता है। परन्तु यह कुछ असङ्गत सा प्रतीत हो रहा है कि जिस शास्त्र में एक हजार अध्याय थे उसकी श्लोक-संख्या केवल २२०० होगी। उशना¹ (शुक्र) तथा बृहस्पति² का उल्लेख महाभारत में अनेक बार किया गया है। एक स्थान पर महाभारत ने³ 'बृहस्पति', 'विशालाक्ष', 'काव्य' (शुक्र), 'इन्द्र' (सहस्राक्ष महेन्द्र), 'प्राचेतस मनु', 'भरद्वाज' तथा 'गौर-शिरा' मुनि को राज-शास्त्र-निर्माता बतलाया है। उसमें एक जगह शम्बर⁴ तथा आचार्य का भी उल्लेख हुआ है। कौटिल्य के अर्थ-शास्त्र में ५ सम्प्रदायों के नाम उल्लिखित हैं—मानव,⁵ बार्हस्पत्य,⁶ औशनस,⁷ पाराशर⁸ तथा आम्भीय⁹। इन सम्प्रदायों के अतिरिक्त सर्वनाम का भी प्रयोग मिलता है—'अपरे',¹⁰ 'एके'¹¹ तथा 'एके'¹²। यह कहना कठिन है कि कौटिल्य ने ज्ञात आचार्यों में से ही कुछ आचार्यों के लिए 'अपरे', 'एके' आदि सर्वनाम का प्रयोग किया है या किसी अज्ञात आचार्य के लिए। इन नामों के अतिरिक्त अर्थ-शास्त्र में निम्न-लिखित आचार्यों के नाम उल्लिखित हैं :—भारद्वाज,¹³ विशालाक्ष¹⁴, पराशर,¹⁵ पिशुन,¹⁶ पिशुन-पुत्र,¹⁷ कौणप-दन्त,¹⁸ वात-व्याधि¹⁹, बाहुदन्ती-पुत्र²⁰ (इन्द्र),


१. शा० पर्व ५७।२; ५७।४०; ३७।१०; ५६।२८; अनु० पर्व-३९।८ इत्यादि।
२. शा० पर्व ५६।३८; ५७।६; ३७।१०; अनु० पर्व-३९।८ इत्यादि।
३. शा० पर्व-५८।१-३।
४. शा० पर्व-१०२।३१-३२।
५. अर्थ-शा०-पृ० १०, ५७, ३७२, ४०१ (चौखम्बा १९६२ ई०)।
६. वही-पृ० १०, ५७, ३७२, ४०२, ८१२।
७. वही-पृ० १०, ५७, ३७२, ४०१, ८१२।
८. वही-पृ० ५४, ६४, ६८२, ६९६।
९. वही-पृ० ६६।
१०. वही-पृ० ३४५।
११. वही-पृ० ७२६।
१२. वही-पृ० ७२६।
१३. वही-पृ० २५, ६४, ५२८, ६८० इत्यादि।
१४. वही-पृ० २५, ५४, ६४, ६८१, आदि।
१५. वही-पृ० २५।
१६. वही-पृ० २६, ५५, ६४, ५२५, आदि।
१७. वही-पृ० ५२५।
१८. वही-पृ० २६, ६४ आदि।
१९. वही-पृ० २६, ६६, ५४९ आदि।
२०. वही-पृ० २७।