Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 35 of 526

Read in context
Page 35

( ३३ )

स्पष्ट चित्रण हमें नैषधीयचरित के¹ श्लोक में भी मिलता है जिसमें यह कहा गया है कि यद्यपि कृत-युग में भी अधर्म का एक पाद वर्त्तमान था परन्तु राजा नल के राज्य-विधान के द्वारा धर्म की पूर्ण-प्रतिष्ठा हो जाने से वह अधर्म व्यापृत नहीं हो पाता था।

राजा के मूल के विषय में अन्यान्य प्राचीन तथा अर्वाचीन मतों के विवरण के लिए म० म० काणे महाशय का "हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र" देखना चाहिए।

नीति-विद्या का मूल तथा इसके प्रवर्त्तक आचार्य

राजा या राज्य के मूल के विषय में जो स्थिति बतलाई गई है साधारणतया वही स्थिति राज-नीति विद्या के मूल के प्रसङ्ग में भी है। महाभारत में यह कहा गया है कि जब धर्म-विप्लव के कारण लोगों में अनाचार² का अत्यधिक उत्कर्ष हो गया तब सन्त्रस्त देवता-गण ब्रह्मा के यहां पहुंचे और उनसे धर्म के उद्धार के लिए प्रार्थना की। तदनन्तर ब्रह्मा ने एक लाख³ अध्यायों में एक शास्त्र की रचना की और उसमें सभी पुरुषार्थ और दण्ड-नीति आदि प्रायः सभी उपयोगी विषयों का समावेश किया गया था। इस शास्त्र का नाम था 'नीति-शास्त्र'⁴


१. पदैश्चतुर्भिः सुकृते स्थिरी-कृते कृतेऽमुना के न तपः प्रपेदिरे ?
मुवं यदेकाङ्घ्रिकनिष्ठया स्पृशन् दधावधर्मोऽपि कृशस्तपस्विताम् ॥
नै० च० १।७ ।।

२. नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् ।
ते त्रस्ता नर-शार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥
प्रसाद्य भगवन्तं तं देवं लोक-पितामहम् ।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे दुःख-वेग-समाहताः ।।
भगवन्नर-लोकस्थं ग्रस्तं ब्रह्म सनातनम् ।
लोभ-मोहादिभिर्भावैः ततो नो भयमाविशत् ।।
अत्र निःश्रेयसं यन्नस्तद्ब्रूयायस्व पितामह ।
शान्ति-पर्व ५९।२२, २३, २४, २७ ।।

३. ततोऽध्याय-सहस्राणां शतं चक्रे स्व-बुद्धिजम् ।
यत्र धर्मस्तथैवार्थः कामश्चैवाभिवर्णितः ।। शा० प० ५९।२९ ।।
इस शास्त्र के विषय-विवरण के लिए इस अध्याय के ७४ श्लोक तक द्रष्टव्य हैं।

४. तत्सर्वं राज-शार्दूल नीति-शास्त्रेऽभिवर्णितम् ।। वही ५९।७४ ।।
३ शु० भू०