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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 329 of 526

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Page 329

चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४३

तत्र यवनधर्म के माननेवाले लोग रहते हैं। और वे वेद से भिन्न कुरान को प्रमाण माननेवाले एवं पश्चिमोत्तर दिशा में निवास करनेवाले हैं।

तदाचार्यैश्च तच्छास्त्रं निर्मितं तद्धितार्थकम् ॥ ३८ ॥
व्यवहाराय या नीतिरुभयोरविवादिनी ।

और उन यवनों के आचार्यों ने उनके हितार्थ शास्त्र भी बनाये हैं। जिसमें उनके व्यवहार के लिये लोक और परलोक के विरुद्ध न रहनेवाली नीति का वर्णन किया गया है।

कदाचिद् बीजमाहात्म्यात् क्षेत्रमाहात्म्यतः क्वचित् ॥ ३६ ॥
नीचोत्तमत्वं भवति श्रेष्ठत्वं क्षेत्रबीजतः ।

कभी बीज (पुरुष) के गौरव से, कभी क्षेत्र (स्त्री) के गौरव से नीच तथा उत्तम के भाव को सन्तान प्राप्त करती है और कभी क्षेत्र तथा बीज दोनों के गौरव से श्रेष्ठता को प्राप्त करती है।

विश्वामित्रश्च वशिष्ठो मतङ्गो नारदादयः ॥ ४० ॥
तपोविशेषैः सम्प्राप्ता उत्तमत्वं न जातितः ।

क्षत्रिय से उत्पन्न हुये विश्वामित्र, स्वर्ग की वेश्या से उत्पन्न हुये वशिष्ठ, साधारण जाति में उत्पन्न हुये मतङ्ग और दासी के पुत्र नारद आदि भी विशेष तप करने से ही उत्तमता को प्राप्त हुये, न कि जाति से।

स्वस्वजात्युक्तधर्मो यः पूर्वैराचरितः सदा ॥ ४१ ॥
तमाचरेच्च सा जातिर्दण्ड्या स्यादन्यथा नृपैः ।
जातिवर्णाश्रमान् सर्वान् पृथक् चिह्नैः सुलक्षयेत् ॥ ४२ ॥

जिसके पूर्वजों ने अपनी २ जाति के लिये कहे हुये जिस धर्म का सदा आचरण किया है उसको उसीका आचरण करना चाहिये। अन्यथा आचरण करने पर उस जाति के लोग राजा द्वारा दण्डनीय होते हैं। और जाति, वर्ण तथा आश्रम के सभी लोगों को पृथक् २ चिह्नों द्वारा पहचान लेना चाहिये।

यन्त्राणि धातुकाराणां संरक्षेद्दीक्ष्य सर्वदा ।

राजा को स्वर्णकारादिकों को सदा कार्य में नियुक्त करने का निर्देश—
स्वर्णादि धातु का कार्य करनेवाले सुनार आदि लोगों के यन्त्रों (औजारों) की परीक्षा करके राजा को उनके पास रहने देना चाहिये।

कारूशिल्पिगणान् राष्ट्रे रक्षेत् कार्यानुमानतः ॥ ४३ ॥
अधिकान् कृषिकृत्ये वा भृत्यवर्गे नियोजयेत् ।
चौराणां पितृभूतास्ते स्वर्णकारादयस्त्वतः ॥ ४४ ॥

कार्यों की अधिकता तथा कमी का विचार करके तद्नुसार राज्य में कारू (बढ़ई) और शिल्पी (चित्रकार) गणों को राजा बसावे। यदि अधिक हों