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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 319 of 526

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Page 319

चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २३३

असर करना भी कला कही जाती है। १३. जितने गुडादि हैं उनके बनाने की विधि जानना कला है।

धात्वौषधीनां संयोग-क्रियाज्ञानं कला स्मृता ।
धातुसांकर्यपार्थक्य-करणं तु कला स्मृता ॥ ७४ ॥

१४. स्वर्णादि धातुओं तथा औषधियों के मिलाने तथा प्रयोग करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं। १५. स्वर्णादि धातुओं को एकत्र मिल जाने के बाद पुनः पृथक् करने को भी कला कहते हैं।

संयोगापूर्वविज्ञानं धात्वादीनां कला स्मृता ।
क्षारनिष्कासनज्ञानं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम् ॥ ७५ ॥
कलादशकमेतद्धि ह्यायुर्वेदागमेषु च ।

१६. धात्वादिकों के अपूर्व रीति से संयोग करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं। १७. क्षार निकालने को भी कला कहते हैं। ये १० कलायें आयुर्वेद-शास्त्र के ग्रन्थों में वर्णित हैं।

शस्त्रसन्धानविक्षेपः पदाद्विन्यासतः कला ॥ ७६ ॥
संध्याघाताकृष्टिमैदैर्मल्लयुद्धं कला स्मृता ।

धनुर्वेदोक्त ५ कलाओं के लक्षण— १८. पैर आदि को पैतरे के साथ रखते हुये निशाना साध कर शस्त्रों के चलाने को भी कला कहते हैं। १९. सन्धि स्थानों पर प्रहार करना तथा पकड़ कर खींचना आदि भेदों के साथ मल्लयुद्ध (कुश्ती लड़ना) करने को भी कला कहते हैं।

बाहुयुद्धन्तु मल्लाना-मशास्त्रं मुष्टिभिः स्मृतम् ॥ ७७ ॥
मृतस्य तस्य न स्वर्गो यशो नेहापि विद्यते ।

बिना शस्त्र के केवल मुष्टियों (मुक्कों) द्वारा प्रहार करते हुये मल्लों का युद्ध होता है उसे 'बाहुयुद्ध' कहते हैं। इसमें जो मरता है उसको न तो स्वर्ग और न इस लोक में यश ही प्राप्त होता है।

बलदर्पविनाशान्तं नियुद्धं यशसे रिपोः ॥ ७८ ॥
न कस्यासीत कुर्याद् वा प्राणान्तं बाहुयुद्धकम् ।

शत्रु के बल के दर्पका नाश होने तक होनेवाला युद्ध किसके यश के लिये नहीं होता है ? अर्थात् सबके लिये होता है। अतः जब तक प्राण न निकल जाय तब तक बाहुयुद्ध करना ही चाहिये।

कृतप्रतिकृतैश्चित्रैर्बाहुभिश्च सुसङ्कटैः ॥ ७९ ॥
सन्निपातावघातैश्च प्रमादोन्मथनैस्तथा ।
कृतं निपीडनं ज्ञेयं तन्मुक्तिस्तु प्रतिक्रिया ॥ ८० ॥

बाहु का प्रहार करना, बाहुप्रहार को रोकना, नाना प्रकार से बाहुप्रहार