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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 289 of 526

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Page 289

चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०३

विनाश करने के लिये सेना की रक्षा करने में तत्पर हो उस समय विशेष प्रकार का अधिक जुर्माना या चुंगी लगाकर प्रजा से धन का हरण करे तो उचित है।

धनिकेभ्यो भृतिं दत्त्वा स्वापत्तौ तद्धनं हरेत्।
राजा स्वापत्समुत्तीर्णस्तत् स्वं दद्यात् सवृद्धिकम् ॥ ११ ॥
आपत्तिरहित होने पर सूद सहित धन वापस करने का निर्देश—और अपने ऊपर आपत्ति आ पड़ने पर 'मैं सूद दूंगा' ऐसी प्रतिज्ञा कर धनिकों से उसके धन को जबरदस्ती राजा को ले लेना चाहिये। तथा जब वह आई हुई अपनी आपत्ति को पार कर जाय तब उस लिये हुये धन को सूदसहित उस (धनिक) को लौटा देना चाहिये।

प्रजाऽन्यथा हीयते च राज्यं कोशो नृपस्तथा ।
हीनाः प्रबलदण्डेन सुरथाद्या नृपा यतः ॥ १२ ॥
प्रबल दण्ड से अनिष्ट फल—अन्यथा अर्थात् धनाभाव से सेना की रक्षा न कर सकने से प्रजा, राज्य, कोश तथा राजा क्षीण हो जाता है। क्योंकि प्रबल दंड के करने से सुरथ आदि राजा लोग हीन अर्थात् राज्यच्युत हो गये।

दण्डभूभागशुल्कैस्तु बिना कोशाद् बलस्य च ।
संरक्षणं भवेत् सम्यग् यावद्विंशतिवत्सरम् ॥ १३ ॥
तथा कोशस्तु संधायैः स्वप्रजारक्षणक्षमः ।
कोश संग्रह करने का प्रमाण—बिना जुर्माना, मालगुजारी तथा चुंगी से प्राप्त धन के भी केवल राजा के कोश से ही २० वर्ष तक सेना की रक्षा भली भांति जितने से हो सकता है उतने कोश का तथा अपनी प्रजा की रक्षा के लिये उपयुक्त संग्रह करना उचित है।

बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम् ॥ १४ ॥
बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिरिरिक्षयः ।
जायते तत्त्रयं स्वर्गः प्रजासंरक्षणेन वै ॥ १५ ॥
प्रजा-संरक्षण के फल—कोश का मूल सेना है अर्थात् सेना के द्वारा कोश का संग्रह होता है, और सेना का मूल कोश है अर्थात् कोश के द्वारा सेना का संग्रह होता है, और सेना तथा कोश की रक्षा करने से कोश तथा राष्ट्र (राज्य) की वृद्धि एवं शत्रुओं का नाश होता है और प्रजा की रक्षा करने से पूर्वोक्त कोश तथा राष्ट्र की वृद्धि एवं शत्रु नाश ये तीनों होते हैं और अन्त में स्वर्ग भी मिलता है।

यज्ञार्थं द्रव्यमुत्पन्नं यज्ञः स्वर्गसुखायुषे ।