शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०१
पणों का), मध्यम साहसों में मध्यमसाहस दण्ड (५०० पणों का) एवं उत्तम साहसों में उत्तम साहस दण्ड (१००० पणों का) विधान अपराधियों के लिये राजा को देना चाहिये।
सोपायाः कथिता मिश्रे मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ११६ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य सुहृदादिलक्षणप्रकरणम्।
इस प्रकार से इस मिश्र अध्याय में सामादिक उपायों के साथ मित्र, उदासीन तथा शत्रु के विषय में कहा गया।
इस प्रकार हिन्दीव्याख्या में चतुर्थाध्याय का सुहृदादिप्रकरण समाप्त।
अथ चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम्
अथ कोशप्रकरणं ब्रूवे मिश्रे द्वितीयकम्।
एकार्थसमुदायो यः स कोशः स्यात् पृथक् पृथक् ॥ १ ॥
कोश के लक्षण— अब 'मिश्र' अध्याय के अन्तर्गत दूसरा 'कोशप्रकरण' का वर्णन करता हूँ। किसी भी एक (समान) वस्तुओं के समूह को 'कोश' कहते हैं वह पृथक् २ अनेक प्रकार का होता है।
येन केन प्रकारेण धनं सञ्चिनुयान्नृपः।
तेन संरक्षयेद्राष्ट्रं बलं यज्ञादिकाः क्रियाः ॥ २ ॥
राजा को जिस किसी भी प्रकार से धन एकत्र करना चाहिये। और उस धन से राष्ट्र (राज्य), सेना तथा यज्ञादि कर्मों की रक्षा करनी चाहिये।
बलप्रजारक्षणार्थं यज्ञार्थं कोशसंग्रहः।
परत्रेह च सुखदो नृपस्यान्यश्च दुःखदः ॥ ३ ॥
सुखप्रद कोश का निर्देश— अतः सेना तथा प्रजा की रक्षा के लिये एवं यज्ञ के लिये जो कोश का संग्रह किया जाता है वह राजा के लिये इस लोक तथा परलोक दोनों के लिये सुखप्रद होता है, इससे भिन्न कार्य के लिये किया हुआ कोशसंग्रह दुःखप्रद होता है।
स्त्रीपुत्रार्थं कृतो यश्च स्वोपभोगाय केवलम्।
नरकायैव स ज्ञेयो न परत्र सुखप्रदः ॥ ४ ॥
दुःखप्रद कोश का निर्देश— जो कोशसंग्रह स्त्री-पुत्र के लिये तथा केवल अपने उपभोग के लिये किया जाता है उसे केवल नरक देनेवाला ही समझना चाहिये क्योंकि वह परलोक में सुखप्रद नहीं होता है।