शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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'राज्' तथा 'रञ्ज्' इन दोनों ही धातुओं से राजा की निष्पत्ति होती है। यह तो राजन् शब्द की व्युत्पत्ति की स्थिति हुई। इस व्युत्पत्ति के आधार पर राजन् शब्द का प्रयोग किसी भी लोकरञ्जक या दीप्तिमान् पुरुष के लिए किया जा सकता है। अब हमें इसके प्रवृत्ति-निमित्त की ओर ध्यान देना चाहिए।
शास्त्र में शब्द के तीन—यौगिक, रूढ तथा योग-रूढ़—अथवा चार—यौगिक, रूढ़, योग-रूढ़ तथा यौगिक-रूढ़—प्रकार माने गए हैं। यौगिक शब्द पूर्णतः व्युत्पत्ति-निमित्त तथा प्रवृत्ति-निमित्त में सामञ्जस्य रखता है। अन्य प्रकार के शब्दों में न्यूनाधिक-भाव से व्युत्पत्ति-निमित्त के साथ प्रवृत्ति-निमित्त का सम्बन्ध¹ रहता भी है और नहीं भी। साधारणतः राजन् शब्द का प्रयोग चार अर्थों में प्रसिद्ध है। ये चार अर्थ हैं—प्रजा-पालक मनुष्य-मात्र, क्षत्रिय-जातीय, अभिषिक्त क्षत्रिय तथा प्रशस्त व्यक्ति।
मीमांसा दर्शन के अवेष्ट्यधिकरण² में 'राजा राज-सूयेन स्वाराज्य-कामो यजेत' इस वैदिक विधि में प्रयुक्त 'राजा' शब्द के अर्थ के विवेचन-प्रसङ्ग में कुमारिल भट्ट³ ने प्रथम अर्थ में राजन् शब्द की लौकिक प्रसिद्धि का उल्लेख किया है। मनु की व्याख्या में कुल्लूक भट्ट आदि ने भी राजन् शब्द का यही अर्थ बतलाया है।
अवेष्ट्यधिकरण में ही शबरस्वामी⁴ ने क्षत्रिय-जाति के प्रसङ्ग में राजन् शब्द-प्रयोग की आन्ध्र-प्रसिद्धि का उल्लेख किया है। मीमांसा के सिद्धान्त के अनुसार भी 'राजा राजसूयेन यजेत' इस विधि-वाक्य में प्रयुक्त राजन् शब्द क्षत्रिय-जाति का ही वाचक प्रतीत होता है। अत एव महाकवि माघ ने इसी सिद्धान्त के आधार पर युधिष्ठिर के द्वारा, राज-सूय यज्ञ के अनुष्ठान⁵ का समर्थन किया
१. अन्यद्धि शब्दानां व्युत्पत्तिनिमित्तम् अन्यच्च प्रवृत्ति-निमित्तम्—विश्वनाथ।
२. अवेष्टौ यज्ञ-संयोगात् क्रतु-प्रधानमुच्यते। पू० मी० द० २।३।३ ॥
३. राज्यस्य कर्त्ता राजेति त्रिषु लोकेषु गीयते।
महा-विषयता चैवं शास्त्रस्यापि भविष्यति। तन्त्र-वार्त्तिक ॥
४. जन-पद-पुर-परिरक्षणवृत्तिमनुपजीवत्यपि क्षत्रिये राज-शब्दमान्ध्राः प्रयुञ्जते—शाबर-भाष्य २।३।३।
५. तत्सुराज्ञि भवति स्थिते पुनः कः क्रतुं यजतु राज-लक्षणम् ।
उद्धृतौ भवति कस्य वा भुवः श्रीवराहमपहाय योग्यता ?
शि० व० १४।१४ ।
सुराज्ञि = विजय-प्रजा-रक्षणादि-गुण-योगात् शुद्धक्षत्रिये, .......राज-लक्षणम् = राज्ञः क्षत्रियस्य, चिह्नम् असाधारणं लक्षणम्—मल्लिनाथ।