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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 263 of 526

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Page 263

तृतीयोऽध्यायः

१७७

भी वस्तुतः वश में हो जाते हैं तब मनुष्यों की क्या बात है ? अर्थात् मनुष्य अवश्य वश में हो जाते हैं । इसीसे कोई भी किसी के सामने उसके दुर्गुणों को नहीं कह सकता है ( क्योंकि वह जानता है कि सुननेवाला क्रुद्ध हो जायगा ) ।

स्वदुर्गुणान् स्वयं चातो विमृशेल्लोकशास्त्रतः ॥ ३०६ ॥

स्वदुर्गुणों का स्वयं विचार करने का निर्देश— अतः स्वयं अपने दुर्गुणों को लोक तथा शास्त्र से विचार करना चाहिये अर्थात् मुझमें कौन-कौन दुर्गुण हैं।

स्वदुर्गुणश्रवणतो यस्तुष्यति न क्रुध्यति ।
स्वोपहासप्रविज्ञाने यतते त्यजति श्रुते ॥ ३०७ ॥
स्वगुणश्रवणान्नित्यं समस्तिष्ठति नाधिकः ।
दुर्गुणानां खनिरहं गुणाधानं कथं मयि ॥ ३०८ ॥
मय्येव चाज्ञताऽप्यस्ति मन्यते सोऽधिकोऽखिलात् ।
स साधुस्तस्य देवा हि कलालेशं लभन्ति न ॥ ३०९ ॥

महान् पुरुष के लक्षण— जो व्यक्ति अपने दुर्गुणों के सुनने से संतोष को प्राप्त होता है और क्रुद्ध नहीं होता है बल्कि अपने उपहासकर दोषों को विशेष रूप से जानने के लिये प्रयत्न करता है । और दोषों को सुनने पर छोड़ देता है । और अपने गुणों को सुनकर नित्य समभाव में रहता है । किसी प्रकार की स्फूत्ति नहीं रखता है अर्थात् खुशी से उछलता नहीं है एवं मैं तो दुर्गुणों का खान हूं अतः मेरे में गुण कैसे आगया, क्योंकि मूर्खता तो केवल मुझमें ही है । ऐसा जो समझता है वह संपूर्ण जगत् के लोगों की अपेक्षा महान् है और वह साधु पुरुष कहलाता है एवं देवता लोग उसकी कला के एक अंश को भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं ( फिर मनुष्यों की बात क्या है ) ॥

सदाऽल्पमप्युपकृतं महत् साधुषु जायते ।
मन्यते सर्षपादल्पं महच्छोपकृतं खलः ॥ ३१० ॥

साधु पुरुष तथा खल पुरुष के लक्षण— सज्जन पुरुष लोग सदा थोड़े भी उपकार को बड़ा समझते हैं और खल लोग बहुत बड़े भारी उपकार को भी सरसो से भी छोटा ( अतितुच्छ ) समझते हैं ।

क्षमिणं बलिनं साधुर्मन्यते दुर्जनोऽन्यथा ।
दुरुक्तमप्यतः साधोः क्षमयेद् दुर्जनस्य न ॥ ३११ ॥

साधु पुरुष क्षमाशील व्यक्ति को बलवान् और दुर्जन पुरुष इससे विपरीत अर्थात् दुर्बल समझते हैं, अतः साधु पुरुष का दुर्वचन सहना उचित है किन्तु दुर्जन का सहना उचित नहीं है ।

१२ शु०