शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 261 of 526
Read in contextतृतीयोऽध्यायः
१७५
गृहस्थियों के सुखदायक विषयों का निर्देश— गुणवती सुशीला स्त्री, सुन्दर गुणवान् सन्तान, उत्तम विद्या, उत्तम धन, अच्छा मित्र, अच्छे नौकर, अच्छी नौकरानी, सुन्दर रोगरहित शरीर, सुन्दर गृह, अच्छा राजा ये १० बातें गृहस्थ पुरुषों के लिये सदा अत्यन्त सुखदायक होती हैं। इनसे विपरीत होने पर सुख के स्थान पर दुःख देनेवाली होती हैं।
वृद्धाः सुशीला विश्वस्ताः सदाचाराः स्त्रियो नराः ।
क्लीबा वाऽन्तःपुरे योग्या न युवा मित्रमप्युत ॥ २६५ ॥
अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण— जो स्त्री पुरुष या नपुंसक देखने में वृद्ध, सुशील, विश्वासी और सदाचारी हों उन्हीं को अन्तःपुर (रनिवास) में नियुक्त करना उचित होता है। किन्तु मित्र भी यदि युवा पुरुष हो तो उसकी नियुक्ति अन्तःपुर के लिये अनुचित होती है।
कालं नियम्य कार्याणि ह्याचरेन्नान्यथा क्वचित् ।
गवादिष्वात्मवज्ज्ञानमात्मानं चार्थधर्मयोः ॥ २६६ ॥
नियुञ्जीतान्नसंसिद्धयै मातरं शिक्षणे गुरुम् ।
समय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि की नियुक्ति करने का निर्देश— समय बांध कर कार्य करना चाहिये, अन्यथा बिना समय बांधे कभी कार्य नहीं करना चाहिये । और गौ आदि पशुओं में भी अपने सदृश व्यवहार (पालन आदि) करना चाहिये, अर्थ और धर्म के उपार्जन में अपने को लगाना चाहिये एवं भोजन बनाने के लिये माता की तथा शिक्षा देने के लिये गुरु की नियुक्ति करनी चाहिये ।
गच्छेदनियमेनैव सदैवान्तःपुरं नरः ॥ २९७ ॥
मनुष्य को सदैव अन्तःपुर में बिना समय बांधे (एकाएक) पहुँच जाना चाहिये (ऐसा करने से दुराचार होने का भय नहीं रहता है)।
भार्याऽनपत्या सद्यानं भारवाही सुरक्षकः ।
परदुःखहरा विद्या सेवकश्च निरालसः ॥ २९८ ॥
षडेतानि सुखायालं प्रवासे तु नृणां सदा ।
प्रवास के समय में सुखदायी अनपत्य भार्यादि ६ का निर्देश— प्रवास के समय मनुष्यों को अपने साथ में बिना सन्तान की स्त्री, अच्छी सवारी, ढोनेवाला कुली, रक्षा करनेवाला सिपाही, दूसरों के दुःख को दूर करनेवाली विद्या, आलस्यरहित (फुर्तीला) नौकर ये ६ सदा अत्यन्त सुखदायक होते हैं।
मार्गं निरुध्य न स्थेयं समर्थेनापि कर्हिचित् ॥ २९९ ॥
सद्यानेनापि गच्छेन्न हट्टमार्गे नृपोऽपि च ।