शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| १६८ | शुक्रनीतिः |
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लिये नित्य प्रयत्नशील रहता है तथा सभी विद्याओं में निपुण होता है, वही (पुत्र) माता-पिता का आनन्द बढ़ानेवाला होता है। और जो माता-पिता की आज्ञा के विपरीत व्यवहार करनेवाला, दुर्गुणों से युक्त तथा धन नष्ट करनेवाला होता है वह दुःखदायी होता है।
पत्यौ नित्यं चानुरक्ता कुशला गृहकर्मणि ॥ २५४॥
पुत्रप्रसूः सुशीला या प्रिया पत्युः सुयौवना।
प्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण— जो स्त्री अपने पति में नित्य अनुराग रखनेवाली, गृहकार्य में चतुर, पुत्र पैदा करनेवाली, सुशीला और सुन्दर यौवनवाली होती है, वह पति की प्यारी होती है।
पुत्रापराधान् क्षमते या पुत्रपरिपोषिणी ॥ २५५॥
सा माता प्रीतिदा नित्यं कुलटाऽन्याऽतिदुःखदा।
आनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण— जो माता पुत्रों के अपराधों को क्षमा करनेवाली एवं उनका परिपोषण करनेवाली है वह नित्य आनन्द देनेवाली होती है, इससे अन्य जो माता कुलटा (व्यभिचारिणी) है वह अत्यन्त दुःख देनेवाली होती है।
विद्यागमार्थं पुत्रस्य वृत्त्यर्थं यतते च यः ॥ २५६॥
पुत्रं सदा साधु शास्ति प्रीतिकृत्स पिताऽनृणी।
आनन्ददायक पिता के लक्षण— जो पिता पुत्र को विद्वान बनाने के लिये एवं उसकी स्थायी जीविका रखने के लिये प्रयत्न करता है और पुत्र को सदा अच्छी शिक्षा देता रहता है एवं अपने ऊपर किसी का ऋण नहीं रखता है वह आनन्ददायक होता है अथवा वह आनन्ददायक तथा पुत्र के ऋण से उऋण होता है।
यः साहाय्यं सदा कुर्यात् प्रतीपन्न वदेत् क्वचित् ॥ २५७॥
सत्यं हितं वक्ति याति दत्ते गृह्णाति मित्रताम्।
मित्र के लक्षण— जो व्यक्ति सदा सहायता करे और कभी प्रतिकूल बात न कहे तथा सत्य एवं हितकर वचनों का उपदेश करे और धनादि दे तथा स्वयं प्रेमवश ले भी वही मित्र बन जाता है, अर्थात् जो मित्र होते हैं उनके ये लक्षण हैं।
नीचस्यातिपरिचयो ह्यन्यगेहे सदा गतिः ॥ २५८॥
जातौ संघे प्रातिकूल्यं मानहान्यै दरिद्रता।
मानहानिकारक कार्यों का निर्देश— नीच पुरुषों के साथ अत्यन्त घनिष्ठता, दूसरे के घर बराबर जाना, जिस जाति में स्वयं हो उस (ब्राह्मणादि) जाति