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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 252 of 526

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Page 252

१६६ | शुक्रनीतिः

स्वामी एक व्यक्ति रहता है तभी तक उसकी शोभा बनी रहती है अनेक स्वामी होने पर शोभा नष्ट हो जाती है।

न च हिंस्रमुपेक्षेत शक्तो हन्याच्च तत्क्षणे ।

हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध— हिंसक पुरुषों या पशुओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये किन्तु सामर्थ्य हो तो तत्काल उनको नष्ट ही कर देना चाहिये क्योंकि देर करना अनिष्टकर होता है।

पैशुन्यं चण्डता चौर्यं मात्सर्यमतिलोभता ॥ २४२ ॥
असत्यं कार्यघातित्वं तथाऽलसकताऽप्यलम् ।
गुणिनामपि दोषाय गुणानाच्छाद्य जायते ॥ २४३ ॥

चुगुलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश— चुगुलखोरी, तीक्ष्णता (अत्यन्तक्रोध), चोरी, मत्सरता, अतिलोभ, असत्य भाषण, कार्य नष्ट करना, अत्यन्त आलस्य ये सब दोष हैं अतः यदि ये गुणवानों को भी हों तो उनके सम्पूर्ण गुणों को ढंक देने वाले होते हैं। अर्थात् इन दोषों से वे निन्दा के पात्र बन जाते हैं।

मातुः प्रियायाः पुत्रस्य धनस्य च विनाशनम् ।
बाल्ये मध्ये च वार्धक्ये महापापफलं क्रमात् ॥ ४४ ॥

बाल्यावस्था आदि में मां आदि के मरने में महापातक के फल का निर्देश— बाल्यावस्था में मां का, युवावस्था में प्रिया स्त्री का, वृद्धावस्था में पुत्र एवं धन का नष्ट हो जाना क्रमसे ये सब प्राक्तन महापाप के फल हैं।

श्रीमत्तामनपत्यत्वमधनानां च मूर्खता ।
स्त्रीणां षण्डपतित्वं च न सौख्यायेष्टनिर्गमः ॥ २४५ ॥

दुःखप्रद विषयों का निर्देश— धनवानों को पुत्र न होना, दरिद्रों को मूर्ख, स्त्रियों को नपुंसक पति मिलना, प्रिय वस्तुओं का अलग हो जाना, ये सब बातें सुख के लिये नहीं होती हैं अर्थात् दुःखप्रद होती हैं।

मूर्खः पुत्रोऽथवा कन्या चण्डी भार्या दरिद्रता ।
नीचसेवा ऋणं नित्यं नैतत्षट्कं सुखाय च ॥ २४६ ॥

सुखकारक न होनेवाली ६ बातों का निर्देश— १. मूर्ख पुत्र अथवा २. कन्या, ३. अत्यन्त क्रोध करनेवाली स्त्री, ४. दरिद्रता, ५. नीच जातिवालों अथवा नीच पुरुषों की सेवा तथा ६. नित्य ऋण लेना ये ६ बातें सुखकारक नहीं होतीं हैं अर्थात् इनसे नित्य मनुष्य दुःखी रहता है।

नाध्यापने नाध्ययने न देवे न गुरौ द्विजे ।
न कलासु न सङ्गीते सेवायां नार्जवे क्रियाम् ॥ २४७ ॥
न शौर्ये न च तपसि साहित्ये रमते मनः ।