शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 244 of 526
Read in context| १५८ | शुक्रनीतिः |
|---|
जो लज्जा का त्याग करनेवाला होता है वह सुखी होता है। देने के समय धन मैत्री कराता है और लेने के समय वही धन शत्रुता करा देता है।
कृत्वा स्वान्ते तथौदार्यं कार्पण्यं बहिरैव च ॥ १९५ ॥
उचितं तु व्ययं काले नरः कुर्यान्न चान्यथा ।
**उचित व्यय करने का निर्देश—**हृदय के अन्दर उदारता रखकर और ऊपर से कृपणता (कंजूसी) रख कर समय आने पर उचित व्यय मनुष्य को करना चाहिये । इससे अन्यथा नहीं करना चाहिये ।
सुभार्यापुत्रमित्राणि शक्त्या संरक्षयेद्धनैः ॥ १९६ ॥
नात्मा पुनरतो त्मानं सर्वैः सर्वं पुनर्भवैत् ।
पश्यति स्म स जीवश्चेन्नरो भद्रशतानि च ॥ १९७ ॥
**भार्या आदि की रक्षा करने का निर्देश—**भार्या, पुत्र और मित्र ये सब यदि उत्तम हों तो इनकी रक्षा धन से करनी चाहिये । और इन सबों से आत्मा (शरीर) की रक्षा करनी चाहिये क्योंकि शरीर दुबारा नहीं मिल सकता है और भार्या-पुत्रादि तो दुबारा भी मिल सकते हैं। और यदि मनुष्य जीवित रहता है तो सैकड़ों कल्याण देखता है।
सदारप्रौढपुत्रान् द्राक् श्रेयोऽर्थी विभजेत् पिता ।
सदारभ्रातरः प्रौढा विभजेयुः परस्परम् ॥ १९८ ॥
**सस्त्रीक प्रौढ़ पुत्रों को धन का विभाग कर देने का अन्यथा अनर्थ की सम्भावना का निर्देश—**अपना कल्याण का चाहनेवाला पिता स्त्री-युक्त एवं कार्य करने में समर्थ हुये पुत्रों को शीघ्र आपस में विभक्त कर दे (जिसमें आपस में भविष्य में कलह न कर सकें) और इसी प्रकार से सहोदर भाई लोग भी विवाह हो जाने एवं प्रौढ (कार्य करने में समर्थ) हो जाने पर आपस में विभाग कर लें अन्यथा परस्पर लड़कर निश्चय मिट जाते हैं।
एकोदरा अपि प्रायो विनाशायान्यथा खलु ।
नैकत्र संवसेच्चापि स्त्रीद्वयं मनुजस्य तु ॥ १९९ ॥
**२ सौत स्त्रियों एवं २ मादाओं को एक पुरुष या नर पशु के साथ एकत्र रखने का निषेध—**यदि किसी पुरुष के पास अथवा स्वतन्त्र दो स्त्रियां हों तो उन दोनों को एवं किसी स्त्री जाति पशु के पास अथवा स्वतन्त्र दो पुरुष जाति के पशुओं को एकत्र नहीं रखना चाहिये । क्योंकि मनुष्य जाति में और पशु जाति में पुरुष एक से अधिक एक जगह कैसे रह सकते हैं ? अर्थात् कभी नहीं रह सकते हैं।
कथं वसेत्तद्बहुत्वं पशूनां तु नरद्वयम् ।
विभजेयुर्न तत्पुत्रा यद्धनं वृद्धिकारणम् ॥ २०० ॥