शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 242 of 526
Read in context१५६ | शुक्रनीतिः
है तो भले ही गुणवान हो किन्तु उसे स्त्री-पुत्रादिक भी छोड़ देते हैं, अतः संसार में व्यवहार चलाने के लिये धन ही सारभूत कहा हुआ है। और इसीसे धन-प्राप्ति के लिये मनुष्य प्राणों को संशय में डालनेवाले कठिन भी कार्यों के द्वारा प्रयत्नशील रहे।
सुविद्यया सुसेवाभिः शौर्येण कृषिभिस्तथा ॥ १८३ ॥
कौसीदवृद्ध्या पण्येन कलाभिश्च प्रतिग्रहैः ।
यया कया चापि वृत्त्या धनवान्स्यात्तथा चरेत् ॥ १८४ ॥
तिष्ठन्ति सधनद्वारे गुणिनः किङ्करा इव ।
और सुन्दर विद्या उपार्जन या सुन्दर सेवा, शूरता, कृषि (खेती) करके या ब्याज पर रुपया ऋण देकर, दूकानदारी या संगीत आदि कला के द्वारा, दान लेकर और अधिक क्या कहें, चाहे जिस किसी वृत्ति का आश्रय लेकर मनुष्य धनवान बन सके उसीके अनुकूल कार्य करे। क्योंकि धनियों के द्वार पर गुणी लोग नौकर के तरह पड़े रहते हैं।
दोषा अपि गुणायन्ते दोषायन्ते गुणा अपि ॥ १८५ ॥
धनवतो ऽनिर्धनस्य निन्द्यते निर्धनोऽखिलैः ।
**धन के प्रभाव का निर्देश—**धनवान पुरुषों के दोष भी गुण के समान हो जाते हैं, और निर्धनों के गुण भी दोष-तुल्य हो जाते हैं। इससे निर्धन की सभी लोग निन्दा ही किया करते हैं।
सुनिर्धनत्वं प्राप्यैके मरणं भेजिरे जनाः ॥ १८६ ॥
प्राप्तायैकेऽचलायैके नाशायैके प्रवव्रजुः ।
कितने एक मनुष्य अत्यन्त दरिद्रता भोगकर मर गये, कितने एक देशान्तर में चले गये, कितने एक पहाड़ों में जा बसे, कितने एक आत्म-हत्या करने के लिये घर से निकल गये।
उन्मादमेके पुष्यन्ति यान्त्यन्ये द्विषतां वशम् ॥ १८७ ॥
दास्यमेके च गच्छन्ति परेषामर्थहेतुना ।
धन के फेर में पड़ कर कितने एक चिन्ता करते २ पागल हो जाते हैं, कितने एक शत्रुओं की अधीनता स्वीकार कर लेते हैं और कितने एक दूसरों की या शत्रुओं की नौकरी भी कर लेते हैं।
यथा न जानन्ति धनं संचितं कति कुत्र वै ॥ १८८ ॥
आत्मस्त्रीपुत्रमित्राणि सलेखं धारयेत्तथा ।
और अपने स्त्री पुत्र या मित्र तक भी जिस प्रकार से यह न जान सकें कि 'इसने कितना और कहां पर धन संचित करके रखा है' इस प्रकार प्रयत्न करे और इसीलिये उस धन को बढ़ने के लिये लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर