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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 228 of 526

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Page 228

१४२ शुक्रनीतिः

न बालं न स्त्रियं चातिलालयेत्ताडयेन्न च ॥ ९८ ॥
विद्याभ्यासे गृहकृत्ये तावुभौ योजयेत्क्रमात् ।
नष्टवस्तु की उपेक्षा करने का निर्देश— जो वस्तु नष्ट हो गई हो उसकी उपेक्षा कर दे और जो उपस्थित हुई हो उसे ग्रहण करे। तथा बालक या स्त्री का अत्यन्त लाड-प्यार करना या अधिक ताडन करना उचित नहीं है। बल्कि उन (बालक तथा स्त्री) को क्रम से विद्याभ्यास तथा गृह-संबन्धी कार्यों में नियुक्त करना उचित है।

परद्रव्यं क्षुद्रमपि नादत्तं स हरेदणु ॥ ९९ ॥
नोच्चारयेदघं कस्य स्त्रियं नैव च दूषयेत् ।
परद्रव्यहरणादि का निषेध— बिना दिये तुच्छ भी दूसरे के द्रव्य (वस्तु) को न ग्रहण करे और दूसरे के छोटे भी पाप को किसी से या पापकर्त्ताओं से न कहे। और किसी स्त्री को दूषित न करे या दोष न लगावे।

न ब्रूयादनृतं साक्ष्यं कृतं साक्ष्यं न लोपयेत् ॥ १०० ॥
प्राणात्ययेऽनृतं ब्रूयात् सुमहत्कार्यसाधने ।
प्राणनाशादि की संभावनामें झूठ बोलने का निर्देश— झूठी गवाही न दे और दी हुई गवाही से पलट न जावे। और जब बहुत बड़ा कार्य सिद्ध करना हो या प्राण-सङ्कट उपस्थित हो तभी झूठ बोले अन्यथा झूठ न बोले।

कन्यादात्रे तु ह्यधनं दस्यवे सधनं नरम् ॥ १०१ ॥
गुप्तं जिघांसवे नैव विज्ञातमपि दर्शयेत् ।
जानकर भी कभी कन्या देनेवाले को 'तुम्हारा यह जामाता (दामाद) दरिद्र है' तथा डाकू को 'यह धनी है' एवं मारनेवाले को 'यह यहां मारने के भय से छिपा हुआ है' ऐसा किसी भी व्यक्ति के बारे में न कहे।

जायापत्योश्च पित्रोश्च भ्रात्रोश्च स्वामिभृत्ययोः ॥ १०२ ॥
भगिन्योर्मित्रयोर्भेदं न कुर्याद् गुरुशिष्ययोः ।
स्त्री-पुरुषादि में भेद डालने का निषेध— स्त्री-पुरुष, माता-पिता, भाई-भाई, स्वामी-भृत्य, बहिन-बहिन, मित्र-मित्र, गुरु-शिष्य इन सबों के बीच परस्पर भेद न डलावे।

न मध्याद् गमनं भाषाशालिनोः स्थितयोरपि ॥ १०३ ॥
सुहृदं भ्रातरं बन्धुमुपचर्य्यात् सदात्मवत् ।
वार्त्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध— और परस्पर बात-चीत करते हुये दो व्यक्तियों के बीच में से न निकले। और मित्र, भाई, बन्धु (स्वजन), इन सबों के साथ सदा अपने समान व्यवहार करना चाहिये।

गृहागतं क्षुद्रमपि यथार्हं पूजयेत् सदा ॥ १०४ ॥