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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 222 of 526

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Page 222

१३६ शुक्रनीतिः

हुये किसी विषय में अपना विचार सदा प्रकट नहीं करना चाहिये। और दूसरे के अभिप्राय को भलीभांति समझकर उससे अज्ञात उत्तर देना चाहिये।

दम्पत्योः कलहे साक्ष्यं न कुर्यात् पितृपुत्रयोः ।
सुगुप्तः कृत्यमन्त्रः स्यान्न त्यजेच्छरणागतम् ॥ ६३ ॥

**दम्पती आदि के बीच में किसी की साक्षी न देने का निर्देश—**स्त्री-पुरुष या पिता-पुत्र की आपसी झगड़े में किसी के तरफ से साक्षी (गवाही) नहीं देनी चाहिये। अपने कार्य तथा विचार को गुप्त रखना चाहिये अर्थात् बिना कार्य पूर्ण हुये प्रकाशित नहीं करना चाहिये। शरण में आये हुये विपत्ति-ग्रस्त का त्याग नहीं करना चाहिये।

यथाशक्ति चिकीर्षेत्तु कुर्यान्मुह्येच्च नापदि ।
कस्यचिन्न स्पृशेन्मर्म मिथ्यावादं न कस्यचित् ॥ ६४ ॥

**आपत्ति में विचलित होने एवं मर्मवेधी बातें करने का निषेध—**यथा-शक्ति प्रत्येक कार्य करने की इच्छा करनी चाहिये। और कार्य करते हुये आपत्ति पड़ने पर विचलित नहीं होना चाहिये। किसी से मर्मवेधी (हृदय में चुभनेवाली) बातें नहीं करनी चाहिये एवं किसी के संबन्ध में या किसी से झूठी बातें नहीं करनी चाहिये।

नाश्लीलं कीर्तयेत् कञ्चित् प्रलापं न च कारयेत् ।

**अश्लील बातें आदि करने का निषेध—**अश्लील (घृणा-लज्जाविधोधक) बातें नहीं करनी चाहिये एवं कोई अनर्थक वचन नहीं बोलना चाहिये।

अस्वर्ग्यं स्याद्धर्म्यमपि लोकविद्वेषितं तु यत् ॥ ६५ ॥
स्वहेतुभिर्न हन्येत कस्य वाक्यं कदाचन ।
प्रविचार्य्योत्तरं देयं सहसा न वदेत् क्वचित् ॥ ६६ ॥

**लोकनिन्दित आदि कार्य करने का निषेध—**जो कार्य लोक में निन्दित होता है वह यदि धर्मयुक्त भी हो तो नरक में ले जानेवाला होता है अतः उसे नहीं करना चाहिये। अपने कारण से किसी की बात को न काटे। खूब विचार करके उत्तर देना चाहिये और सहसा कभी नहीं बोलना चाहिये।

शत्रोरपि गुणा ग्राह्या गुरोस्त्याज्यास्तु दुर्गुणाः ।

**शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करने का निर्देश—**शत्रुओं के भी गुणों को ग्रहण करना चाहिये या उनका अभिनन्दन करना चाहिये। और गुरुजनों के भी दुर्गुणों को छोड़ देना चाहिये।

उत्कर्षो नैव नित्यः स्यान्नापकर्षस्तथैव च ॥ ६७ ॥
प्राक्कर्मवशतो नित्यं सधनो निर्धनो भवेत् ।
तस्मात् सर्वेषु भूतेषु मैत्रीं नैव च हापयेत् ॥ ६८ ॥