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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 22 of 526

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Page 22

( २० )

उपाय है, अतः उसे या उसके प्रापण को राजा का साक्षात् कर्त्तव्य नहीं माना जा सकता। राजा का कर्त्तव्य तो है 'स्व-स्व-'धर्म-प्रापण' ( सन्मार्ग-प्रापण ) ही, उसके उपाय के रूप में दण्ड का प्रापण भले ही आता हो। अतः इस अर्थ को अभिव्यक्त करने वाले 'दण्ड-नीति' शब्द को 'नीति' ( सन्मार्ग-प्रापण ) का पर्याय नहीं माना जा सकता। साध्य-साधन में अभेदोपचार के आधार पर कहना तो प्रकारान्तर है।

अस्तु, प्रकृत 'नीति' ( सन्मार्ग-प्रापण ) का उद्देश्य है 'अभ्युदय'। किन्तु आत्माभ्युदय तब तक सर्वाङ्गीण नहीं हो पाता है जब तक पर का अवसाद न हो जाय। इसलिए पर-विनाश-पूर्वक आत्माभ्युदय को 'नीति' का लक्ष्य माना जा सकता है।

इस सन्दर्भ में महाकवि माघ का निम्न-लिखित कथन द्रष्टव्य है—
आत्मोदयः परग्लानिः द्वयं नीतिरितीयती।$^१$
तदूरीकृत्य कृतिभिः वाचस्पत्यं प्रतायते ॥

अतः यह सिद्ध होता है कि दण्ड अथवा दण्डनीति ( दण्ड-प्रापण ) से 'नीति' ( सन्मार्ग-प्रापण ) और 'नीति' से 'अभ्युदय' होता है। अतः अभ्युदय को दण्ड या दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) का भी फल कहा जा सकता है। अत एव सन्मार्गावलम्बन के द्वारा आत्माभ्युदय के प्रसाधक किसी भी तत्त्व को औपचारिक रूप में दण्ड या दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) माना जा सकता है।

उपर्युक्त आत्माभ्युदय के भी दो रूप हैं—ऐहलौकिक तथा पारलौकिक। ऐहलौकिक अभ्युदय पारलौकिक अभ्युदय की भूमिका है। अत एव उचित रीति के द्वारा ऐहलौकिक अभ्युदय—अर्थागम—के प्रयोजक 'वार्ता' को भी उपचारतः दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) और संक्षेप में 'नीति' कहा जा सकता


१. कुलानि जातीः श्रेणीश्च गणान् जानपदानपि।
स्व-धर्मात् प्रच्युतान् राजा विनीय स्थापयेत् पथि॥
या० स्मृ० १।३६१॥

स्वेषु धर्मेष्ववस्थाप्य प्रजाः सर्वा महीपतिः।
म० भा० ( शा०प० ) ६०।१०॥
इसके स्पष्टी-करण के लिए उद्धरण सं० १७ भी द्रष्टव्य है।

२. शिशुपाल-वध—२।३०॥

तुलना कीजिए—
नृपस्य परमो धर्मः प्रजानां परिपालनम्।
दुष्ट-निग्रहणं नित्यं न नीत्या ते विना ह्युभे ॥ शु० नी० सा० १।१४॥